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कभी नाम नहीं लिख पाती थीं, आज कर रहीं हिसाब-किताब, गोरखपुर की शिक्षिका संगीता ने बदल दी 500 महिलाओं की जिंदगी

Published: Tue, 08 Sep 2026 06:02 PM (IST)

गोरखपुर की प्रधानाध्यापक संगीता ने पिछले आठ वर्षों में 500 से अधिक महिला अभिभावकों को साक्षर बनाया है, जिससे उनके जीवन में आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता आई है।

स्कूल परिसर में पढ़ाती संगीता

स्कूल परिसर में पढ़ाती संगीता

HighLights

  1. प्रधानाध्यापक संगीता ने 500 से अधिक महिलाओं को साक्षर किया।

  2. महिलाएं अब अपना नाम लिखती हैं, हिसाब-किताब करती हैं।

  3. अक्षर ज्ञान से आत्मविश्वास बढ़ा, आत्मनिर्भरता की राह खुली।

प्रभात कुमार पाठक, गोरखपुर। पहले हाथ में कागज आता था तो नजरें झुक जाती थीं। नाम लिखने की बारी आती तो अंगूठे का निशान लगाकर काम पूरा करना पड़ता था। बच्चों की कापी खोलने पर अक्षरों की दुनिया अनजानी लगती थी। लेकिन आज उन्हीं हाथों में कलम है।

महिलाएं अपना नाम लिख रही हैं, हिसाब-किताब कर रही हैं, बैंक के काम समझ रही हैं और मोबाइल भी चला रही हैं। सबसे बड़ी बात यह कि अब वे अपने बच्चों की कापी खोलकर उनका गृहकार्य भी देख रहीं हैं।

भरोहिया ब्लॉक के बिस्टौली गांव में आया यह बदलाव किसी बड़े अभियान की चमक-दमक से नहीं, बल्कि एक प्रधानाध्यापक की उस संवेदना से शुरू हुआ, जिसने बच्चों के साथ उनकी मां के भविष्य को भी गढ़ने का फैसला किया। पिछले आठ वर्षों में वे 500 से अधिक महिला अभिभावकों को साक्षर बना चुकी हैं।

प्राथमिक विद्यालय बिस्टौली की प्रधानाध्यापक संगीता ने शैक्षिक सत्र 2018-19 में विद्यालय का कार्यभार संभाला। इसके बाद बच्चों की पढ़ाई और उनकी नियमित उपस्थिति को लेकर उन्होंने अभिभावकों से लगातार संपर्क शुरू किया। इसी दौरान एक तस्वीर बार-बार उनके सामने आई।

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कई महिला अभिभावक हस्ताक्षर करने के स्थान पर अंगूठे का निशान लगा रही थीं। बातचीत आगे बढ़ी तो पता चला कि इन महिलाओं के मन में भी पढ़ना-लिखना सीखने की इच्छा है। अपने बच्चों को पढ़ाने का सपना देखने वाली इन माताओं के भीतर कहीं न कहीं खुद अक्षरों से दोस्ती करने की चाह भी थी, लेकिन झिझक और अवसर की कमी उनके कदम रोक रही थी।

संगीता ने महिलाओं से कहा कि विद्यालय बंद होने के बाद वे कुछ समय निकालकर उनके कार्यालय में आ सकती हैं। यहां उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाने में पूरी मदद की जाएगी। शुरुआत आसान नहीं थी। महिलाएं झिझक रही थीं। उम्र के इस पड़ाव पर पढ़ने-लिखने की बात उन्हें असहज करती थी।

लेकिन कुछ महिलाएं हिम्मत जुटाकर विद्यालय पहुंचीं। फिर धीरे-धीरे यह सिलसिला बढ़ता गया। अक्षरों को पहचानने से शुरू हुआ सफर शब्दों तक पहुंचा और फिर लिखने-पढ़ने के आत्मविश्वास में बदल गया। जो महिलाएं कभी अपने नाम के स्थान पर अंगूठा लगाती थीं, वे अब स्वयं हस्ताक्षर कर रही हैं।

शिक्षित हुईं तो खुली आत्मविश्वास की नई दुनिया

अक्षर ज्ञान ने इन महिलाओं के जीवन में केवल पढ़ना-लिखना ही नहीं जोड़ा, बल्कि आत्मविश्वास की एक नई दुनिया भी खोल दी। बदलाव का असर बच्चों की पढ़ाई पर भी दिखाई देने लगा है। पहले जो मां बच्चों की कापी और किताबों से दूरी महसूस करती थीं, अब वे गृहकार्य में उनकी मदद कर रही हैं और पढ़ाई को लेकर अधिक सजग हैं।

शिक्षिका संगीता कहती हैं कि महिलाओं में आया यह परिवर्तन उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है। उनके अनुसार, जब एक मां शिक्षित और जागरूक होती है तो उसका असर सिर्फ एक व्यक्ति तक नहीं, बल्कि पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ी तक पहुंचता है।

अक्षर ज्ञान के साथ आत्मनिर्भरता की भी सीख

महिलाओं को साक्षर बनाने के साथ ही प्रधानाध्यापक संगीता ने उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में भी पहल की। ग्रामीण महिलाओं के लिए विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कराए।

उद्देश्य सिर्फ इतना नहीं था कि महिलाएं पढ़ना-लिखना सीखें, बल्कि यह भी था कि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें और स्वावलंबन की दिशा में आगे बढ़ें। इसी सोच के तहत वे प्रतिवर्ष एक महिला अभिभावक को स्वावलंबन के लिए सिलाई मशीन भी प्रदान करती हैं।

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