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गोरखपुर बालिका हत्याकांड: कातिल सिपाही पर पहले भी लगे थे गंभीर आरोप, फिर इसी जिले में कैसे हो गई तैनाती

Published: Fri, 31 Jul 2026 02:35 PM (IST)

गोरखपुर में बर्खास्त सिपाही अभिषेक यादव को गंभीर आरोपों के बावजूद फिर से उसी जिले में डायल-112 में तैनात कर ...और पढ़ें

आरोपी अभिषेक यादव। जागरण

आरोपी अभिषेक यादव। जागरण

HighLights

  1. बर्खास्त सिपाही अभिषेक यादव की गोरखपुर में बहाली।

  2. पहले युवती से हैवानियत के गंभीर आरोप लगे थे।

  3. निलंबन के 90 दिन बाद बहाली नियमों पर बहस।

जागरण संवाददाता, गोरखपुर। डायल-112 में तैनात रहा बर्खास्त सिपाही अभिषेक यादव पर इससे पहले भी एक युवती के साथ हैवानियत का आरोप लग चुका था। गोरखनाथ थाने में मुकदमा दर्ज होने के बाद उसे जेल भेजा गया। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि गंभीर आरोप लगने के बाद भी उसे दोबारा फिर उसी जिले में ड्यूटी कैसे मिल गई। इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

फरवरी 2025 में अभिषेक यादव पर बंगाल की रहने वाली एक युवती को रेलवे स्टेशन से पूछताछ के बहाने ले जाकर उसके साथ हैवानियत करने का आरोप लगा था। उस मामले में उसे निलंबित कर दिया गया था।

पुलिस विभाग के नियमों के अनुसार सिपाही का निलंबन पुलिस अधीक्षक (एसएसपी/एसपी) स्वयं कर सकते हैं, जबकि इंस्पेक्टर और दारोगा के निलंबन के लिए डीआइजी या आइजी रेंज का अनुमोदन आवश्यक होता है। निलंबन के बाद पुलिसकर्मी की तैनाती किसी थाने में नहीं रहती। उसे पुलिस लाइन से संबद्ध कर दिया जाता है, जहां सुबह और शाम की हाजिरी देना अनिवार्य होता है।

इस अवधि में उसे पूरा वेतन नहीं, बल्कि नियमानुसार निर्वाह भत्ता (आमतौर पर मूल वेतन का लगभग आधा) मिलता है। विभागीय नियमों के अनुसार यदि निलंबन के 90 दिन के भीतर विभागीय आरोप पत्र (चार्जशीट) जारी नहीं किया जाता, तो सामान्यतः निलंबन की समीक्षा की जाती है और परिस्थितियों के अनुसार कर्मचारी को बहाल किया जा सकता है। यदि आरोप पत्र जारी हो जाता है तो निलंबन जारी रह सकता है और विभागीय जांच आगे बढ़ती है।

जांच पूरी होने के बाद नियुक्ति प्राधिकारी रिपोर्ट के आधार पर अंतिम निर्णय लेते हैं। चर्चा है कि गंभीर घटना कारित करने के बाद भी मामले को गंभीरता से नहीं लिया। जेल से छूटने के बाद सितंबर 2025 में ही उसे बहाल करके फिर से इसी जिले में डायल 112 में ही तैनाती दे दी गई।

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पुलिस रेगुलेशन में छोटे और बड़े दंड का प्रावधान
पुलिस रेगुलेशन एक्ट के तहत विभागीय जांच में आरोप सिद्ध होने पर दंड की अलग-अलग श्रेणियां हैं। धारा 14(2) के तहत लघु दंड दिए जा सकते हैं, जिनमें वेतन वृद्धि रोकना, वेतन कटौती या अन्य हल्की विभागीय कार्रवाई शामिल है। जबकि धारा 14(1) के तहत गंभीर दंड का प्रावधान है। इसमें कर्मचारी को मूल वेतन पर लाना, पदावनत करना या सेवा से बर्खास्त तक किया जा सकता है।

अंतिम दंड विभागीय जांच रिपोर्ट के आधार पर नियुक्ति प्राधिकारी तय करता है। यही कारण है कि किसी पुलिसकर्मी का निलंबन अपने आप सेवा समाप्ति नहीं माना जाता। विभागीय प्रक्रिया पूरी होने और अंतिम आदेश जारी होने तक बहाली की संभावना बनी रहती है। अभिषेक यादव के मामले ने अब इस पूरी व्यवस्था पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है कि गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे पुलिसकर्मियों की बहाली के मानक और निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

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