गोरखपुर, क्षितिज पांडेय। सुख और समृद्धि के पर्व दीपावली पर उत्साह-उमंग होना स्वाभाविक ही है। पर, हर्ष-उल्लास के इस मौके पर हमारी जरा सी असावधानी या यूं कहें कि अति-उत्साह हमारी अपनी और शहर की सेहत पर भारी पड़ रही है। पर्व की रात अधिक से अधिक आतिशबाजी करने की होड़ शहर की आबोहवा को जहरीली बना देती है जिसका सीधा दुष्प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। तेज आवाज करने वाले पटाखे जहां ध्वनि प्रदूषण का स्तर इस दिन विशेष पर कई गुना बढ़ा देते हैं वहीं आतिशबाजी वायु को बुरी तरह प्रदूषित कर देती है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और एमएमएम प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय द्वारा पिछले वर्षों में किए गए आकलन से प्राप्त आंकड़े बताते हैं साल-दर-साल दिवाली पर प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है।

दो महीने तक रहता है असर

विशेषज्ञों के मुताबिक दिवाली के दिन जितना प्रदूषण होता है, उसका असर हवा में करीब दो महीने तक रहता है। यही प्रदूषित हवा सांस के जरिए हमारे शरीर को बीमार करती है। दिवाली पर आतिशबाजी से हवा के जहरीले होने की वजह मौसम भी है। दरअसल, अक्टूबर से ओस गिरना शुरू हो जाती है और हवा भी नहीं चलती है। इससे पटाखों से निकला जहरीला धुआं ज्यादा ऊपर नहीं जा पाता और हमारे आसपास के वातावरण में घुल जाता है। एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआइ) का लेवल 150 होने पर ही हमारे शरीर को नुकसान पहुंचने लगता है, जबकि दिवाली के समय यही एक्यूआइ 350 से 400 तक पहुंच जाता है।

गोरखपुर में ऐसा रहा दिवाली पर प्रदूषण

वर्ष  - अधिकतम ध्वनि स्तर - पीएम 10

2018- 91.8 - 110.30

2017- 89.6 - 120.04

2016- 93.7 - 114.14

2015- 88.7  -101.58

पीएम 10 की गणना आरएसपीएम (रेस्पिरेबल सस्पेंडड पार्टिकल मैटर) में है। यह 10 माइक्रॉन से छोटे आकार वाले कण होते हैं। औद्योगिक और रिहायशी इलाकों में पीएम 10 अगर 60 आरएसपीएम तक हो तो सामान्य माना जाता है। ध्वनि स्तर की गणना डेसिबल में है। सामान्य स्थितियों में दिन के समय शहर में ध्वनि का स्तर औसतन 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल के आसपास रहता है। आंकड़े रिहायशी इलाकों के हैं।

रंगीन रोशनी वाले पटाखे सबसे खतरनाक

लाल : स्ट्रॉन्टियम के इस्तेमाल से बने पटाखों से लाल रंग निकलता है। यह छोटे बच्चों की वृद्धि पर प्रभाव डालता है और उनकी हड्डियों के विकास को रोकता है।

हरा : हरे रंग की रोशनी देने वाले पटाखों में बोरिक एसिड का इस्तेमाल होता है, जिससे शरीर में संक्रमण हो सकता है।

नीला : इस रोशनी वाले पटाखों में डायक्सिन होता है। इससे कैंसर होने की संभावना होती है।

नारंगी : नारंगी रंग के लिए सोडियम क्लोराइड का इस्तेमाल होता है, जिससे ब्लड प्रेशर, किडनी संबंधी बीमारी हो सकती है।

बैंगनी : रूबिडियम और पोटैशियम से बैंगनी रंग बनता है। इसमें कार्सिनोजेनिक या हार्मोन्स को खराब करने वाले केमिकल्स होते हैं, जिससे हार्ट अटैक का खतरा ज्यादा रहता है।

सफेद: सफेद रोशन पैदा करने वाले पटाखों में मैग्नीशियम, टाइटेनियम और एल्युमिनियम का प्रयोग होता है, यह अल्जाइमर के कारक हो सकते हैं।

यह खुशी मनाने का जरिया नहीं

पर्यावरणविद प्रो. सीपीएम त्रिपाठी का कहना है कि अगर हम सच्चे अर्थों में दिवाली पर समृद्धि की कामना करते हैं तो पर्यावरण की समृद्धि को नजरअंदाज कैसे किया जा सकता है? आखिर उसका सीधा असर हमारी अपनी सेहत पर पड़ता है। दीपावली सुख और समृद्धि का पर्व है। खुशी जताने का एकमात्र जरिया आतिशबाजी ही नहीं है। पर्यावरणविद प्रो. गोविंद पांडेय का कहना है कि दीपावली के पहले और बाद के आंकड़े चौंकाने वाले होते हैं। पीएम 10 का मानक स्तर 60 आरएसपीएम हैं, पर आकलन बताता है कि हम इस मानक स्तर को बनाए रखने के लिए कतई कोशिश नहीं करते। पर्यावरण का सुरक्षित होना हमारे अस्तित्व का अहम कारक है। इसका ध्यान रखना ही होगा। 

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