जागरण संवाददाता, देवरिया

यूं तो हर मासूम को मामून (सुरक्षा देने वाला) चाहिए, लेकिन देवरिया के बाल गृह में रह रहा बांग्लादेश का 11 वर्षीय मासूम दो साल से अपने पिता मामून का इंतजार कर रहा है। मां की गोद के लिए तरस रहा है। दो भाई-बहनों के साथ खेलने के लिए तड़प रहा है। उसकी आंखों के आंसू कब खत्म होंगे, किसी को नहीं पता। बांग्लादेश में रह रहे उसके पिता ने पैसे की कमी से वीजा न मिलने का हवाला दिया है। मासूम नौ साल की उम्र में परिवार के साथ अजमेर शरीफ में चादरपोशी के लिए आया था, लेकिन उनसे बिछुड़ गया।

मासूम के पिता मामून बांग्लादेश के किशनगंज जिले के गोपालश्रम में रहते हैं और राजमिस्त्री हैं। जून, 2019 में वह परिवार सहित चादरपोशी के लिए अजमेर शरीफ आए थे। वापसी में ट्रेन से दिल्ली जा रहे थे। किसी स्टेशन पर मासूम पानी लेने के लिए उतरा। ट्रेन चल दी और किसी को पता नहीं चला। बदहवास मासूम दूसरी ट्रेन में बैठ गया, जो उसे गोरखपुर ले आई। यहां चाइल्ड लाइन ने प्लेटफार्म पर भटकते देख उसे अपने संरक्षण में लिया और चार महीने शेल्टर होम में रखा। नवंबर, 2019 में उसे देवरिया के राजकीय बाल गृह भेज दिया गया।

बांग्लादेशी भाषा के कारण मासूम अपना दर्द किसी को बता नहीं पा रहा था। उसके हिदी सीखने की व्यवस्था कराई गई। नवंबर 2020 में उसने अपने परिवार के बारे में बताया। जिला प्रोबेशन विभाग ने मासूम के बताए पते पर नवंबर, 2020 से जनवरी, 2021 तक तीन पत्र भेजे। पिता मामून ने मासूम से बिछुड़ने की पुष्टि की और फोन नंबर भी दिया। पिता मामून व मां सासोदा से फोन पर बातचीत हो रही है। पिता ने बताया कि पैसे की तंगी है और वीजा नहीं मिल रहा है। विभाग ने बांग्लादेश के दूतावास और महिला कल्याण निदेशालय को पत्र भेजकर मासूम को बांग्लादेश के निकट के जिले में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया है। हालांकि कोविड के चलते कार्रवाई नहीं हो सकी है। मासूम यहां नवंबर, 2019 से है। बांग्लादेशी दूतावास को दो बार पत्र भी भेजा जा चुका है। माता-पिता से संपर्क किया गया है। वह बता रहे हैं कि पैसों की तंगी के कारण वीजा नहीं ले पा रहे हैं।

प्रभात कुमार, जिला परिवीक्षा अधिकारी

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