गोरखपुर, जेएनएन। सड़क पर घूम रहे बेसहारा पशुओं को अब तस्करी के रास्ते नेपाल भेजने का काम शुरू हो गया है। तस्कर इस कार्य में पगडंडी का इस्तेमाल तो कर रही रहे हैं। अब नदी के रास्ते का भी इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। लगता है कि सुरक्षा एजेंसियों की इन तस्करों पर नजर नहीं पड़ी अन्यथा अब तक कोई न कोई कार्रवाई जरूर हो गई होती। या फिर यह हो सकता है कि पुलिस की मौन स्वीकृति के बाद तस्करों ने बेसहारा पशुओं को नेपाल भेजने में जल्दबाजी शुरू कर दी है। जो भी हो, बेसहारा पशुओं की धड़ल्ले से नेपाल के लिए तस्करी जारी है।

पशु तस्करों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के बावजूद भारत-नेपाल का सीमावर्ती इलाका पशु तस्करों के लिए काफी सुरक्षित बना है। यहां कस्टम, पुलिस व अन्य सुरक्षा एजेंसियों के सख्त पहरे के बावजूद गोवंशीय पशुओं को नेपाल भेजने का सिलसिला बदस्तूर जारी है।

ठंड की आड़ में सरहद के दोनों तरफ पशु तस्करों का नेटवर्क काफी सक्रिय हो गया है। तस्कर क्षेत्र में घूम रहे गोवंशीय पशुओं व पड़ोसी जनपदों से लाए गए गाय व बछड़ों को लोगों की नजर से बचते हुए पहले सूनसान स्थानों व बागीचों में बांध दे रहे हैं और फिर मौका देख उन्हें एक-एक कर नेपाल की सीमा में पहुंचा दे रहे हैं। ऐसा नहीं है कि सीमावर्ती कोल्हुई, नौतनवा, परसामलिक, बरगदवा व सोनौली थानों की पुलिस व सरहद पर तैनात सुरक्षा एजेंसियां मामले से अंजान हैं। बावजूद इन कारोबारियों पर ठोस कार्रवाई नहीं होने से इनका हौंसला बुलंद हो रहा है।

पुलिस क्षेत्राधिकारी धर्मेंद्र कुमार यादव ने कहा कि पशु तस्करों पर पुलिस की पैनी नजर है। यही कारण है कि चोरी छुपे पशुओं को नेपाल ले जाने की कोशिश कर रहे तस्करों को पकड़ लिया जा रहा है।

भूसे की कमी से बढ़ी बेजुबानों की मुश्किल

फरेंदा तहसील क्षेत्र के बेजुबानों के जीवन पर भूसे की कमी से संकट उत्पन्न हो गया है। पशुपालकों के सामने पशुओं को खिलाने के लिए चारे का प्रबंध कर पाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। भूसे की कमी से पशुपालक अपने पशुओं को औने-पौने दामों में बेचने को मजबूर हैं। तो वहीं कई पशुपालक चारे की व्यवस्था न हो पाने के कारण अपने पशु को चरने के लिए छोड़ दे रहे हैं। जिससे यह बेसहारा पशु किसानों की खेतों में खड़ी फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं। भूसे की महंगाई से पशुपालक काफी परेशान हैं। पशुपालक अवधराज, बुद्धु, रंगीलाल, रामप्रकाश, रामबेलास, चंद्रशेखर, जंजाली, रामनयन, राकेश यादव के मुताबिक भूसे के दाम में वृद्धि के कारण पशुओं को पालना मुश्किल हो गया है। भूसे के अभाव में लोग धान का पुआल महंगे दाम पर खरीद कर खिलाने को विवश हैं।

ठंड में पशुओं का दूध हुआ कम

ठंड के चलते ग्रामीण क्षेत्र में पशु बेहाल हैं। जिसका असर उनके स्वास्थ्य व उनसे मिलने वाले दूध पर भी पड़ रहा है। पशुपालक शत्रुघन यादव, सुखदेव यादव, महेंद्र यादव ने बताया कि जो पशु 10 से 12 लीटर दूध देते थे, वे अब ठंड व चारे के संकट के चलते पांच से छह लीटर दूध दे रहे हैं। वहीं अत्यधिक ठंड के कारण पशु बीमार भी हो रहे हैं।

Posted By: Jagran

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