गोरखपुर: इंटरनेट के प्रति बढ़ता रुझान अब तेजी से लोगों की आदत में शुमार होता जा रहा है। इसकी बढ़ती लत लोगों के कामकाज पर असर डालने लगी है। जापान, कोरिया, अमेरिका व यूरोप में हालात पहले ही गंभीर हैं, भारत में भी यह समस्या तेजी से घर करती जा रही है। अब तो यह बीमारी का रूप लेने लगी है।

मानसिक रोग विशेषज्ञों की संस्था एसोसिएशन आफ साइकेट्रिस्ट इन प्राइवेट प्रैक्टिस उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के तत्वावधान में आयोजित सम्मेलन यह बातें डा. कुंवर वैभव ने कहीं। फैजाबाद से आए डा. वैभव ने कहा कि दुनिया के विभिन्न देशों में बढ़ रही इस समस्या को इंटरनेट गेमिंग डिस्आर्डर का नाम दिया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस पर शोध की आवश्यकता पर बल दिया है। इस दिशा में रिसर्च की शुरुआत हो चुकी है। इंटरनेट की बढ़ती आदत लोगों के कार्य को प्रभावित करने लगी है। यह पाया गया है कि सोशल मीडिया, फेसबुक, वाट्सएप के लती लोग ज्यादातर समय इसी में लगे रहते हैं। काम व मीटिंग छोड़कर बीच-बीच में देखते रहते हैं कि रिप्लाई आई या नहीं। बच्चों तक में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है।

गाजियाबाद से आए मानसिक रोग विशेषज्ञ डा. विपुल त्यागी ने कहा कि मानसिक रोगियों की तादाद देश में तेजी से बढ़ रही है। लेकिन, रोग की पहचान व जागरूकता के अभाव में कुल रोगियों में से सिर्फ दस फीसद ही मानसिक रोग विशेषज्ञों से इलाज करा रहे हैं। बड़ी तादाद ऐसे मरीजों की है जो रोग का लक्षण पहचान नहीं पाते और फिजिशियन, गैस्ट्रोइंट्रोलॉजिस्ट, कार्डियोलॉजिस्ट व न्यूरोलॉजिस्ट से इलाज करा रहे हैं। जरूरी है कि परिवार के लोग बीमारी के लक्षण को पहचानें व बिना रोग को छिपाए मरीज का इलाज कराएं। यदि किसी व्यक्ति में व्यवहार में अचानक परिवर्तन, मन में बेचैनी, अचानक आवेश में आना, जल्दी रोना, अकारण क्रोध, दुख, खुशी उत्पन्न होने लगे तो यह मानसिक रोग के लक्षण हो सकते हैं। इसी तरह अचानक नींद में कमी, व्यवहार परिवर्तन, कार्य करने में अचानक दिक्कत होने लगे तो भी सावधान हो जाना चाहिए।

छत्तीसगढ़ रायपुर से आई डा. सोनिया परियल ने कहा कि अब गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में अवसाद के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। यह आंकड़ा दस से 15 फीसद तक पहुंच चुका है। इसकी कई वजहें सामने आई हैं। आजकल एकल परिवार का चलन होने से महिला को इस दौरान अकेला रहना पड़ता है। इसके अलावा गर्भावस्था के ही दौरान बच्चे के पालन-पोषण, पढ़ाई लिखाई आदि के खर्च के बारे में सोचने से मानसिक परेशानी बढ़ती देखी जा रही है। नौकरी पेशा महिलाओं को प्रसव के बाद बच्चे की देखभाल की चिंता भी सताने लगती है। कई बार पति-पत्‍‌नी की इच्छा न होने के बावजूद अनचाहा गर्भ ठहरना व घरेलू ¨हसा भी इसकी वजहें हैं। उन्होंने कहा कि यदि गर्भावस्था के दौरान महिला की सेहत पर ध्यान नहीं दिया गया तो बच्चे तो भी आगे चलकर मधुमेह, बीपी व मानसिक रोगों की शिकायत हो सकती है।

इस दौरान विशेषज्ञों ने मेंटल हेल्थ केयर एक्ट- 2017 पर भी चर्चा की। बताया कि यह कानून जुलाई 2018 से ही लागू है। नेशनल इंस्टीट्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज बेंगलुरु के प्रोफेसर डा. सुरेश बीएम ने एक्ट पर चर्चा की।

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