वर्ष 2016, योगिराज बाबा गम्भीरनाथ की पुण्यतिथि का शताब्दी साल है। इस उपलक्ष्य में गोरक्षपीठ ने कई कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय लिया है। कार्यक्रमों का सिलसिला साल भर तक चलेगा। शुरुआत 5 अप्रैल से होगी। गोरखनाथ मंदिर स्थित दिग्विजनाथ सभागार में मंगलवार को उद्घाटन समारोह होगा। इस मौके पर गंभीरनाथ के जीवन पर आधारित एक पुस्तक और डाकटिकट का लोकार्पण होगा। समारोह में बतौर मुख्य अतिथि केंद्रीय मंत्री सुश्री उमा भारती एवं विशिष्ट अतिथि विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह उपस्थित रहेंगे।

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-बाबा गंभीरनाथ के आध्यात्मिक प्रभाव से गोरखनाथ मंदिर को मिला नवजीवन

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गोरखपुर: योगिराज बाबा गम्भीरनाथ, सिद्ध पुरुष, योग मानव और समाधि योगसिद्ध महात्मा थे। उनका प्रभाव असाधारण है। उन्होंने नाथ सम्प्रदाय के योग सिद्धांत को पुनर्जीवन दिया। वह भी तब, जब पीठ के सामने चुनौतियां थीं। उसके वजूद पर संकट था।

उस समय उन्होंने पीठ की धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृति परंपरा के संरक्षण के साथ संव‌र्द्धन भी किया। ब्रह्मालीन महंत दिग्विजय नाथ उनको अपना परम गुरु मानते थे। वह कहते थे कि इस मठ और मंदिर की सेवा में मैं जो कुछ कर सका हूं, वह सब मेरे परमगुरू और गुरू की कृपा का नतीजा है। मेरी सभी कर्मशक्तियों और विचारशक्तियों के मूल में यही दोनों हैं। मठ और मंदिर की जो तरक्की हुई और हो रही है सबके पीछे उनकी ही प्रेरणा और शक्ति है। मेरे जीवन में कई बार बड़े संकट आए, पर उनकी कृपा से बिना किसी कष्ट के उनसे छुटकारा मिल गया।

नाथयोग परंपरा में पिछले सात-आठ सौ वषरें में उनके जैसे योगी का दर्शन नहीं हुआ। हिमालय से कन्याकुमारी तक बीसवीं सदी में इतने सिद्ध योगी का दर्शन दुर्लभ था। उन्होंने मानवता को योग-शक्ति से संपन्न किया। गुरु गोरखनाथ के जीवन से आध्यात्मिक प्रेरणा लेते हुए उन्होंने हठयोग, राजयोग और लययोग के क्षेत्र में सिद्धि प्राप्त की। बीसवीं सदी में उन्होने गुरु गोरखनाथ की योग साधना पद्धति का प्रतिनिधित्व करते हुए योग एवं ज्ञान का समन्वय किया। अपने समय में वे योग रहस्य के सर्वमान्य मर्मज्ञ, माया के बंधन से मुक्त सिद्ध पुरुष थे। उन्होंने महर्षि पतंजलि और गुरु गोरक्षनाथ की योग परंपरा का समन्वय किया। उन्होंने गुरु गोरखनाथ की योग परंपरा के जरिये शिव-शक्ति की एकात्मकता-कुंडलिनी जागरण का साक्षात्कार किया। वे शांति एवं गंभीरता के उज्वलतम रूप थे। बड़े-बड़े संतों और महात्माओं ने उनके चरणों में अपनी श्रद्धा समर्पित कर आत्ममोक्ष का विधान प्राप्त किया। गोरखनाथ मंदिर को उनके आध्यात्मिक प्रभाव से नवजीवन मिला। अपने समय में मंदिर स्थित एक छोटे से कमरे में रहने वाले इस अल्पभाषी सिद्ध योगी और संत का प्रभाव दूर देश तक फैला था।

-'गोरक्षपीठाधीश्वर एवं सांसद महन्त योगी आदित्यनाथ'

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