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बारिश ने रोका रथ तो फॉर्च्यूनर पर सवार होकर रणभूमि पहुंचा रावण, मुकाबला करने ट्रैक्टर-ट्रॉली पर आया रामदल

Published: Sat, 10 Oct 2026 03:57 PM (IST)

गोंडा में भारी बारिश के कारण रामलीला में रावण का रथ मैदान तक नहीं पहुंच सका, जिसके बाद रावण फॉर्च्यूनर पर सवार होकर रणभूमि पहुंचा।

फॉर्च्यूनर पर सवार होकर रणभूमि पहुंचा रावण।

फॉर्च्यूनर पर सवार होकर रणभूमि पहुंचा रावण।

HighLights

  1. बारिश के कारण रावण का रथ मैदान तक नहीं पहुंचा।

  2. रावण फॉर्च्यूनर एसयूवी पर सवार होकर रणभूमि आया।

  3. रामदल ट्रैक्टर-ट्रॉली पर मुकाबले के लिए डटा रहा।

धनंजय तिवारी, गोंडा। मूसलाधार बारिश से मैदान में लबालब पानी और सामने राम-रावण युद्ध की चुनौती। रावण का रथ रामलीला मैदान तक पहुंचना मुश्किल था, लेकिन आयोजकों की आस्था और संकल्प के आगे मौसम की बाधा भी छोटी पड़ गई। फिर निकला ऐसा रास्ता, जिसने वर्ष 2022 की रामलीला के इस प्रसंग को यादगार बना दिया।

रावण अपने दल के साथ फॉर्च्यूनर (एसयूवी) पर सवार होकर रणभूमि में पहुंचा तो रामदल भी ट्रैक्टर-ट्रॉली पर सवार होकर मुकाबले के लिए डटा रहा। बारिश के बीच फॉर्च्यूनर ही रावण का रथ बन गई और इसी पर सवार होकर उसने युद्ध किया।

यह दृश्य बताता है कि आस्था केवल परंपराओं को निभाने में नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में उन्हें जीवंत रखने के संकल्प में भी बसती है। इस रामलीला की खासियत यह है कि यहां मंच पर उतरने वाले कलाकार पेशेवर अभिनेता नहीं, बल्कि मुहल्ले के छात्र, व्यापारी और नौकरी पेशा लोग विभिन्न किरदार की जिम्मेदारियां निभाते हैं।

नगर पालिका परिषद गोंडा के पंतनगर मुहल्ले में श्री संकट मोचन सांस्कृतिक सेवा समिति की ओर से रामलीला मंचन की तैयारियां शुरू हो गई हैं। समिति के संरक्षक मंडल के सदस्य अधिवक्ता अजय शंकर श्रीवास्तव बंटी व महामंत्री मनोज मिश्र ने बताया कि 12 अक्टूबर से रामलीला का शुभारंभ होगा।

11 दिनों तक चलने वाले आयोजन में मुहल्ले के लोग अलग-अलग पात्रों की भूमिका निभाएंगे। इस रामलीला की खासियत यह है कि यहां मंच पर उतरने वाले कलाकार पेशेवर अभिनेता नहीं, बल्कि मुहल्ले का रहना वाला कोई छात्र है तो कोई कर्मचारी, व्यापारी और युवा। पंतनगर में रामलीला की शुरुआत वर्ष 1977 में हुई थी।

करीब 49 वर्षों से यह आयोजन मुहल्ले की सामूहिक सहभागिता और धार्मिक आस्था का प्रतीक बना हुआ है। यहां रामायण के पात्र भले ही त्रेतायुग की कथा को मंच पर जीवंत करते हों, लेकिन उनके पीछे आज के समाज के अलग-अलग वर्गों का सहयोग है।

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