जासं, लौवाडीह (गाजीपुर) : विभिन्न प्रांतों से आए प्रवासी मजदूर जब कुछ दिनों पूर्व अपनी दशा को याद करते हैं तो सिहर जाते हैं। घर पर झोपड़ी में रहते हुए उन्हें ऐसा लगता है जैसे उन्हें जन्नत नसीब हो गया है। औरंगाबाद के रवि कुमार कहते हैं कि उनका काम बंद हो गया था कुछ दिनों तक खाना मिला लेकिन बाद में परेशानी होने लगी। लुधियाना से लौटे रविद्र कुमार ने कहा कि जितने दिन पैसा रहा उतने दिन भोजन की व्यवस्था थी उसके बाद न तो खाना मिलता था और न ही घर मे रहने के लिए किराया था। इसलिए विवश होकर घर आना पड़ा। दिल्ली से 1500 रुपये भाड़ा देकर ट्रक से आया मजदूर ने कहा कि लॉकडाउन के प्रथम चरण में तो सब कुछ ठीक था लेकिन बाद में खाना राशन की परेशानी होने लगी और लौट के उन्हें आना पड़ा। लुधियाना से पारो का अखिलेश संतोष विनोद जब आने की कोई व्यवस्था नहीं हुई और दाने-दाने के मोहताज हुए तो किसी तरह बचे रुपये से साइकिल खरीदी और यात्रा शुरू कर दी।लखनऊ तक की यात्रा पूरी करने के बाद वहां के प्रशासन द्वारा उनकी साइकिल जब्त कर ली गई और उन्हें बस द्वारा भेज दिया गया। यहां आने के बाद घर में क्वारंटीन की व्यवस्था नहीं थी वे क्वारंटीन सेंटर में रहना चाहते थे, लेकिन वहां से होम क्वारंटीन के लिए कह दिया गया। यहां पर शासन द्वारा अनाज मुहैया कराया जा रहा है और मनरेगा में काम भी मिला है।

Posted By: Jagran

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