यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 10, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
श्रम की साधना से मिलता है सफलता का सुफल
जिदा रहने और जीवन जीने दोनों में काफी अंतर है। खाट पर पड़े हैं कभी बोल पाते हैं कभी नहीं ...और पढ़ें

जिदा रहने और जीवन जीने दोनों में काफी अंतर है। खाट पर पड़े हैं, कभी बोल पाते हैं, कभी नहीं, लेकिन सांस चल रही है। यह जीना भी कोई जीना है। कई लोगों के पास अथाह संपत्ति है। बैंक खाते भरे हैं। कई प्लाट हैं, पर चेहरे से लगता है मानो जीवित लाश हों। सुख का कोई चिह्न ही नहीं, लेकिन दुनियादारी के लिहाज से सफल कहे जाते हैं। पिछले दिनों एक मित्र मिले। जीवनभर कविता-कहानी लिखते रहे। कई किताबें छप चुकी हैं। एकाध जुगाड़ू पुरस्कार भी ले चुके हैं। उनकी रचनाओं पर शोध करके एक युवती को पीएचडी भी मिल गई, लेकिन मिलने पर ऐसा लगा कि किसी मृत व्यक्ति से मिल रही हूं। कसम से, ऐसे नजारे के बाद तो हमें सफलता से घृणा होने लगी है। कई इंसान ऐसे मिलते हैं, जिन्हें कोई जानता नहीं। जिनके पास धन नहीं। जिन्होंने कभी कुछ लिखा नहीं, लेकिन मानो किसी उमसभरी गर्मी में शीतल जल से स्नान कर लिया हो। सफलता को लेकर हम बड़े कनफ्यूज हैं। दूसरों के किस्से छोड़कर अपनी ही सोचें। समाज में तो क्या हमारी तो घर में भी नहीं चलती। हिदू धर्म में हजारों तरह की विद्या और साधना का वर्णन मिलता है। साधना से सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
आज के युग को तकनीक का युग कहा जाता है, लेकिन इस युग में श्रम को साधना की तरह ही पूजा जाता है। यदि श्रम में कमी है तो सफलता प्राप्त करना बेहद मुश्किल है। जीवन में श्रम ही सफलता की साधना है। किसी भी दिशा में, किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करनी है तो इसके लिए श्रम साधना करनी ही होगी। श्रम के बिना सफलता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अमेरिका और जापान जैसे देशों की सफलता का रहस्य उनके नागरिकों द्वारा किए जाने वाला अनवरत श्रम साधना ही है। श्रम साधना करने से आत्मिक शांति प्राप्त होती है। ह्रदय पवित्र होता है। सच्चे ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है और मनुष्य उन्नति की पराकाष्ठा पर पहुंचता है। परिश्रमी व्यक्ति को यश तथा धन दोनों मिलते हैं। साथ ही आत्मसंतुष्टि भी मिलती है। वहीं यदि श्रम के बिना सफलता मिल भी जाए तो इससे आत्मसंतुष्टि नहीं हो सकती। सही मायने में कहें तो व्यक्ति को उसकी कीमत समझ नहीं आएगी। वह अपनी सफलता की अहमियत नहीं समझ पाएगा। ऐसे में शीघ्र ही उसका पतन निश्चित है। ऐसा कोई भी कार्य नहीं जो साधना से पूर्ण नही किया जा सके। देश की उन्नति में साधना ही एकमात्र साधन है। इसी साधना से हम आगे बढ़कर अपने देश के प्रति कुछ नया, कुछ अनोखा कर सकते हैं। वह श्रम ही है, जिससे विकास की रचना की जा सकती है। भाग्य का हमारे जीवन में बहुत महत्व होता है, लेकिन श्रम से कोई भी व्यक्ति अपने भाग्य को बदल सकता है। आपका किया श्रम आने वाले समय में भी काम आता है। -सुषमा त्रिपाठी, प्रधानाचार्या, ब्लूम पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल, प्रताप विहार।
