'पढ़ाई करती तो शायद जिंदा होती तीनों बहनें', गाजियाबाद ट्रिपल सुसाइड केस से मनोचिकित्सक भी हैरान
Ghaziabad triple suicide गाजियाबाद के भारत सिटी सोसाइटी में तीन बहनों की आत्महत्या से मनोचिकित्सक हैरान हैं। विशेषज्ञों का मानना ...और पढ़ें
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बच्चियों के पिता और उनका सुसाइड नोट। फोटो- जागरण

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
शोभित शर्मा, साहिबाबाद। भारत सिटी सोसायटी में तीन सगी बहनों के एक साथ आत्महत्या करने की घटना से मनो चिकित्सक और मनोवैज्ञानिक भी हैरान हैं। (मोबाइल की लत) एडिक्शन को डिजिटल एडिक्शन बताते हुए चिकित्सकों का मनाना है कि अगर तीनों बहनों की पढ़ाई न छूटती, स्कूल जातीं तो शायद तीनों जिंदा होतीं।
उनके समय का एक बड़ा हिस्सा स्कूल में गुजरता और पढ़ाई करने में गुजरता लेकिन इतने समय से स्कूल न जाने से शायद तीनों में डिजिटल एडिक्शन को बढ़ा दिया। इस पूरे मामले पर मनोचिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों ने कुछ इस तरह से राय रखी...

कोरियन कल्चर से प्रभावित थी बहनें, कमरे बिखरी पड़ी तस्वीरें।
शुरुआत में एक्शन लेना बहुत जरूरी
जिला एमएमजी अस्पताल स्थित जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम में तैनात मनोचिकित्सक डा. साकेत नाथ तिवारी मानते हैं कि तीनों बहनों के एक साथ आत्महत्या करने की वजह अनुवांशिक तनाव भी हो सकती है लेकिन जिस तरह के तथ्य सामने आए हैं, उससे लगता है कि शुरुआत में एक्शन लेना बहुत जरूरी था। खासतौर पर तब जब बच्चियों ने पढ़ाई को छोड़ा।
तीन साल से ज्यादा समय से बच्चियां स्कूल नहीं जा रही थीं। मां-बाप को उन्हें स्कूल भेजना चाहिए था। आनलाइन गेम्स की बात की जाए तो बच्चे जब हारने लगते हैं तो इस तरह के कदम उठाते हैं।

भारत सिटी सोसायटी के मामले में पता चला है कि तीनों का एक साथ नहाना, रहना, टायलेट जाना, हो सकता है कि कोरियन कल्चर को लेकर उनका मनोरोग बढ़ा और उनको समझ नहीं आया कि मोबाइल नहीं या ये कल्चर नहीं तो क्या करना है लेकिन पुलिस जांच इसमें अहम है, जिससे इस केस और बच्चियों की मनोस्थिति पता चलेगी।
रोकने के साथ समझाना भी जरूरी
मनोचिकित्सक डॉ. हेमिका अग्रवाल का कहना है कि तीनों बच्चियों ने आत्महत्या एक साथ की, इसका मतलब है कि तीनों ने एक-दूसरे में अपना दोस्त ढूंढ रही थीं। समाज में कौन मोबाइल इस्तेमाल नहीं कर रहा लेकिन लत की बात हो तो बच्चों को सामने रख देते हैं। बच्चे भी सोचते हैं कि परिवार में सभी लोग फोन चला रहे हैं, तो ऐसे लोग भी तो बीमारियों से ग्रस्त हैं।

तकनीकी को गले लगाना है या इसे नियंत्रित करना है। इसे समझना होगा। बैलेंस बनाकर तकनीक का इस्तेमाल करना जरूरी है। मध्यम मार्ग को चुनकर ही बच्चों को बताया जा सकता है कि इसका इस्तेमाल यहां सही है और यहां गलत लेकिन इसके लिए आपको खुद बच्चों के सामने मोबाइल के अधिक इस्तेमाल से बचना होगा। बच्चों को रोकने के साथ समझाना भी बहुत जरूरी है।
शुरू हो जाता है पर्सनेल्टी डिसऑर्डर
मनोवैज्ञानिक डॉ. संजीव त्यागी का मानना है कि कोरियन गेम या कोरियन कल्चर में ढलना, इस तरह के मामलों में पर्सनेल्टी डिसआर्डर भी हो सकता है। मां-बाप का बच्चों पर ध्यान देना जरूरी है। शुरुआत के समय ही बच्चों को इसके नुकसान के बारे में बताया जाए।
मोबाइल चलाने से एक साथ रोकने के बजाय धीरे-धीरे इसकी शुरुआत की जाए। यानी बच्चों को एक समय के लिए ही मोबाइल दें, उनसे बात करें कि वो क्या देखते हैं।
बंदिश बढ़ाने की कोशिश के बजाय अगर मां-बाप ने समय दिया होता तो नतीजा कुछ और होता। कई ऐसे बदलाव बच्चे में दिखने लगते हैं, जिससे पता किया जा सकता है कि बच्चे में मोबाइल की लत किस कदर बढ़ गई है।
ऐसे करें डिजिटल एडिक्शन की पहचान
- बच्चा स्कूल जाने से पहले मोबाइल लेगा और स्कूल से आते ही मोबाइल लेगा
- खाना खाते समय बच्चा मोबाइल देखेगा
- घर में मेहमानों के आने पर बच्चा अपने मोबाइल के साथ मशगूल होगा
- बच्चा धीरे-धीरे दोस्तों, रिश्तेदारों से कटना शुरू कर देता है
- मोबाइल न देने पर बच्चा चीखने चिल्लाने लगता है
- कई मामलों में बच्चे आक्रामक तक हो जाते हैं
ऐसे करें बचाव
- बच्चे को मोबाइल की लत छुड़वाने के लिए पहले खुद इससे दूरी बनाएं
- बच्चे के साथ समय व्यतीत करें और उसके साथ घुलें-मिलें
- बच्चे को आउटडोर गेम खेलने के लिए प्रोत्साहित करें।
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