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11 साल तक लड़ी लड़ाई, 42 तारीखों में सुनवाई... आखिर गाजियाबाद गुलमोहर ग्रीन सोसायटी के लोगों को मिला न्याय

Published: Thu, 29 Oct 2026 11:40 AM (IST)

गाजियाबाद के मोहननगर स्थित गुलमोहर ग्रीन सोसायटी के निवासियों ने बिल्डर के खिलाफ 11 साल लंबी कानूनी लड़ाई जीती है। ...और पढ़ें

मोहन नगर स्थित गुलमोहर ग्रीन सोसायटी में बने फ्लैट जिनको तोड़ा जाना है। जागरण

मोहन नगर स्थित गुलमोहर ग्रीन सोसायटी में बने फ्लैट जिनको तोड़ा जाना है। जागरण

HighLights

  1. गुलमोहर ग्रीन सोसायटी के निवासियों ने 11 साल लड़ाई लड़ी।

  2. बिल्डर के अवैध निर्माण और मनमानी के खिलाफ मिली जीत।

  3. 42 सुनवाईयों के बाद हाईकोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला।

राहुल कुमार, जितेंद्र सिंह, साहिबाबाद (गाजियाबाद)। गाजियाबाद में मोहननगर में हिंडन एयरफोर्स के सामने गुलमोहर ग्रीन सोसायटी के बिल्डर के खिलाफ चली लड़ाई लोगों के लिए आसान नहीं थी।

पिछले 11 साल निवासियों ने न्याय की आस में लड़ाई लड़ी। इस बीच 42 तारीखों पर सुनवाई हुई, तब जाकर निवासियों को न्याय मिला। हक की लड़ाई के लिए हर कोई आगे आया।

जरूरी काम भी छोड़ने पड़े

11 याचिकाकर्ताओं ने हथियार उठाए और कोर्ट में अपनी पीड़ा रखी। लोगों ने चंदे के रूप में लाखों रुपये दिए जो केस की लड़ाई में खर्च हुए, लोगों को जरूरी काम भी छोड़ने पड़े। लेकिन कोर्ट से जो आस थी वह 27 अक्टूबर को पूरी हुई तो अब जाकर निवासियों के चेहरे पर खुशी आई।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सोसायटी में फ्लैट खरीदते समय बिल्डर ने सपने दिखाये थे लेकिन बाद में वह मनमानी पर उतारू हो गया। उसने बार-बार कंपाउंडिंग के जरिये तय सीमा से कई गुना अधिक फ्लैट बना लिए। इससे उनके अधिकारों का हनन शुरू हुआ और सोसायटी में मिलने वाले सुविधाओं पर प्रभाव पड़ा।

इसके खिलाफ उन्होंने जीडीए में करीब 100 से अधिक शिकायतें बिल्डर के खिलाफ कीं। लेकिन सुनवाई नहीं हुई। परेशान गुलमोहर ग्रीन रेजीडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने वर्ष 2015 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

इसके बाद कानूनी लड़ाई शुरू हुई। लड़ाई लंबी चली। लेकिन पैरवी के अभाव में हाईकोर्ट ने केस को वर्ष 2024 में खारिज कर दिया। इस दौरान 30 तारीख लगीं।

इसके बाद भी लोगों ने हार नहीं मानी, इस बार लड़ाई लड़ने के लिए 11 याचिकाकर्ता खड़े हुए और सभी ने एक साथ बिल्डर के खिलाफ लामबंदी करते जुलाई 2025 में कोर्ट में दोबारा से याचिका दायर की, इसमें पुरानी याचिका को भी शामिल किया गया।।

इस बार सभी ने फैसला लिया कि कुछ भी हो जाए, न्याय लेकर ही रहेंगे। सभी 12 तारीखों पर केस में मजबूत पैरवी करते हुए याचिकाकर्ताओं व उनके अधिवक्ताओं ने मजबूत साक्ष्य व दस्तावेज कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए।

वहीं, सभी 11 याचिकाकर्ताओं की मेहनत कामयाब हुई और उनका न्यायपालिका पर भरोसा बरकरार रहा। 27 अक्टूबर को हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद निवासियों ने न्यायालय का आभार जताया है और इस फैसले को सच्चाई की जीत करार दिया है।

इन 11 याचिकाकर्ताओं ने की जीत हासिल

मुख्य याचिकाकर्ता सुरेश चंद्र, विजयवीर सिंह राणा, अजय प्रताप, गणेश चंद्र मिश्र, ज्ञानेंद्र सिंह, प्रमोद सिंह पंवार, प्रशांत दत्त, दिलीप त्रिपाठी, डा. राजीव अधाना, मोहन लाल शर्मा, प्रतीक कुमार तिवारी। ये सभी याचिकाकर्ता 55 से 76 वर्ष की उम्र के हैं।

100 लोग आए आगे, केस के लिए दिया चंदा

यह मामला कुछ याचिकाकर्ता लड़ रहे थे लेकिन केस लड़ने के लिए समय और धनराशि दोनों की आवश्यकता थी। इसको लेकर सोसायटीवासियों की याचिकाकर्ताओं के साथ बैठक हुई। इसमें सभी ने सहयोग करने का आश्वासन दिया। किसी ने पांच हजार तो किसी ने 10 हजार तक की मदद की।

इसके बलबूते पर याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट जाकर पैरवी की और लाखों रुपये के खर्च किए। इस दौरान उनके कई जरूरी कार्य भी प्रभावित हुए।

बिल्डर की मनमानी से सालों तक परेशान रहे निवासी

मुख्य याचिकाकर्ता सुरेश चंद्र ने बताया कि वर्ष 2006 में सोसायटी का नक्शा पास हुआ था। करीब 720 फ्लैट बने। इसके बाद 2011-12 में दो बार कंपाउंडिंग कराई गई और फ्लैटों की संख्या बढ़कर 984 हो गई। तीसरी बार में जब 112 फ्लैटों का निर्माण हुआ तो इसके खिलाफ हाईकोर्ट का रुख अपनाया गया। इंफ्रास्ट्रक्चर आज भी अधूरा है।

वहीं, लोन के नाम पर बिल्डर ने कामन एरिया भूतल पर रहने वालों को बेच दिया था। ये एरिया सोसायटी वालों को सुविधाएं विकसित करने के लिए था जो अब वापस मिलेगा। वहां पर रहने वाले लोगों को भी 10 प्रतिशत ब्याज के साथ रकम मिलेगी।

बिल्डर ने अपनी परियोजना का सीसी कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं लिए। बिल्डर सोसायटी में नक्शे के विपरीत निर्माण कराता रहा लेकिन सोसायटी में मूलभूत सुविधाओं पर काम नहीं किया। - अजय प्रताप, याचिकाकर्ता

नक्शे के विपरीत निर्माण किया जा रहा था। इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान नहीं दिया गया। वो आज भी अधूरा है। सोसायटी में सुविधाएं विकसित नहीं की जा रही है। - प्रतीक तिवारी, याचिकाकर्ता

पिछले साल जुलाई में दोबारा हाईकोर्ट गए थे। हाईकोर्ट ने फैसला सुना कर लोगों को न्याय दिया है। हमारा न्यायपालिका पर भरोसा और बढ़ गया है। - सुदेश पाल जैन, निवासी

बिल्डर की मनमानी लगातार जारी रही और कंपाउंडिंग करता रहा। इससे निवासियों को परेशानी हुई। नक्शे के विपरीत बनाए गए दो टावर जर्जर हो गए हैं। इनसे कभी भी हादसा हो सकता है। - प्रेम सिंह, स्थानीय निवासी

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