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जंग ए आजादी-जब फूंक दिया हिरनगांव रेलवे स्टेशन

By Edited By: Fri, 03 Aug 2012 08:59 PM (IST)

निज प्रतिनिधि, फीरोजाबाद: यह रोमांचक वाकया करीब सन् 1942 के आसपास है। उस समय महात्मा गांधी के 'करो या मरो' के नारे ने युवाओं में भी जोश भर दिया था। पूरे देश में आजादी का आंदोलन उग्र रहा था तो फीरोजाबाद के युवाओं की भुजाएं भी फड़कने लगीं। आगरा तक आंदोलनों में शिरकत करने वाले दीवाने भी संघर्ष करने उतर पड़े। इसी दौरान जोशीले युवाओं के एक दल ने एक दिन हिरनगांव रेलवे स्टेशन को निशाना बनाकर फूंक दिया, जिसकी गूंज पूरे देश तक हुई।

सन् 1942 की क्रांति में हिरनगांव रेलवे स्टेशन फूंकने की घटना फीरोजाबाद की एक ऐतिहासिक घटना है। इसकी रणनीति उस समय बनी, जब बापू सहित आंदोलन के कई अगुआ गिरफ्तार हो गए। तब महात्मा गांधी ने युवाओं से कुछ कर दिखाने का आह्वान किया था। इसके बाद स्थानीय नवयुवक भी कुछ खास करने की योजना बनाने में जुट गए। फिर योजनाबद्ध तरीके से हिरनगांव रेलवे स्टेशन को चुना गया। इसके बाद 17 अगस्त 1942 को रूपसपुर के भूप सिंह शर्मा एवं गंर्धव सिंह यादव ने टीम के साथ स्टेशन पर धावा बोल दिया। युवाओं के जत्थे ने स्टेशन पर पहुंचते ही पहले टेलीफोन के तार काटे, फिर रेल पटरियों की फिश प्लेटों को खोल दिया। इसी बीच फतेह सिंह शर्मा कुछ साथियों के साथ में रेलवे स्टेशन में दफ्तर में प्रवेश कर गए। वहां रेलवे कर्मचारियों ने प्रतिरोध किया तो टकराव की स्थिति पैदा हो गई। इस पर गुस्साए युवा दीवानों ने स्टेशन के कार्यालय में मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी। आग लगते ही कर्मचारी यहां से भाग खड़े हुए। फिर पूरे स्टेशन और रेलवे कार्यालय पर क्रांतिकारी जत्थे का राज था। कार्यालय से भागे कर्मचारियों ने किसी तरह पुलिस तक सूचना पहुंचाई। परंतु तब तक युवाओं का जत्था स्टेशन को तहस नहस करके फरार हो चुका था।

संदेश: फोटो नंबर दो

इंसेट बॉक्स

15 वर्ष की उम्र में कूद गए थे..

फीरोजाबाद: पं.भूप सिंह शर्मा 15 वर्ष की उम्र में आजादी के आंदोलन में कूद गए थे। 1904 में जन्मे पं.भूप सिंह का हर सुबह दंड- बैठक करने का नियम था। कई बार जेल यात्रा के दौरान भी उनका यह क्रम अनवरत जारी रहा। लिहाजा जेल में भी उन्हें उनके साथी सरदार के नाम से पुकारा करते थे।

फोटो नंबर 4

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जब बाल-बाल बचे थे बाबूजी..

फीरोजाबाद : सन् तो मुझे ठीक- ठीक याद नहीं है। बाबूजी बताया करते थे उस दौर में रेलवे लाइन के किनारे टेलीफोन के तार होते थे। क्रांतिकारी तार काटते थे लिहाजा रेलवे लाइन पर इन तारों के निकट किसी को देखते ही गोली मारने के आदेश थे। बाबूजी हर वक्त कुछ न कुछ योजना बनाते रहते थे। उनके एक साथी थे झम्मन। एक दिन बाबूजी ने झम्मन को बुला कर कहा चलो कुछ काम करना है। एक रस्सा, कटर एवं टार्च लेकर वह दोनों चले गए। रेलवे लाइन के निकट वह खंभे पर चढ़कर तार काट रहे थे। दो तार कट गए तो एक तरफ बैलेंस बिगड़ने से पोल गिर पड़ा। इसी दौरान वहां पर इंजन आ गया तथा सिपाही उतर कर उन्हें ढूंढने लगे। साथ में आए झम्मन खेतों में छिप गए तथा उन्होंने सोचा बाबूजी पोल गिरने से हादसे का शिकार हो गए। इधर सिपाहियों ने टार्च से खोजबीन शुरू कर दी। जहां सिपाही खड़े थे उस मेड़ के नीचे बाबूजी छिपे हुए थे। बाबूजी बताते थे अगर उस दिन टार्च का मुंह सामने के बजाए सिपाही नीचे कर देते तो शायद कुछ भी हो सकता था।

-मंजू शर्मा

पुत्री पं.भूपसिंह शर्मा

फोटो नंबर तीन

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