अयोध्या : सुप्रीम फैसले से रामलला के साथ रामनगरी का संगीत भी रोशन हुआ। फैसला आने से पूर्व ही राष्ट्रीय स्तर के न्यूज चैनलों ने नगरी का मिजाज भांपने की कोशिश की और यह बताने के लिए वे कई स्थानीय संगीतज्ञों को लेकर सामने आए। ..तो संगीतज्ञों ने भी अपनी प्रस्तुति से अयोध्या को बखूबी बयां किया। उनकी प्रस्तुति विभिन्न चैनलों पर फौरी तौर पर प्रसारित हुई ही, यू ट्यूब एवं सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों पर प्रतिष्ठित हुई और उन्हें थोक के भाव में लाइक भी मिली।

मंदिरों के सांस्कृतिक आयोजनों की शान समझे जाने वाले मिथिलाबिहारीदास ने कल्पना नहीं की थी कि सबसे बड़े विवाद के समाधान की बेला में उन्हें अपनी प्रस्तुति का मंच भी मिलेगा। ऐसा प्रस्ताव सामने आने के साथ उन्होंने स्वयं को तैयार किया और अपनी प्रस्तुति से यह बताने की चेष्टा की कि सवाल न्याय का है न कि किसी के विरोध का।

रामचरितमानस की पंक्ति जेहि विधि सुखी होहि पुर लोगा/ करहुं कृपा निधि सोइ संजोगा तथा भजो रे मन प्रेम से राम रघुरइया.. जैसी प्रस्तुति से मिथिलाबिहारीदास खूब सुने गए।

देश ने सबसे बड़े फैसले को तो शिरोधार्य कर लिया अब सीएए के विरोध में उपद्रव पर क्या संदेश देना चाहते हैं, यह सुनते ही मिथिलाबिहारीदास हारमोनियम संभालते हुए राग छेड़ते हैं- बिगरल रहे पांडु सुतन के भटके जंगल-जंगल/ नारायण प्रभु कृपा पायकै भइलै दूर अमंगल।

मूलत: झारखंड के रहने वाले युवा मानवेंद्रदास 'मानस' को स्थानीय संगीत के क्षितिज पर छुपा रुस्तम माना जाता रहा पर सुप्रीम फैसले के साथ वे छुपे नहीं रह सके और उनकी प्रतिभा पूरी चमक के साथ सामने आई। शास्त्रीय संगीत के समर्पित साधक मानस को इसी के बाद दिल्ली के प्रेस क्लब में मिथिला महोत्सव का मंच मिला और वहां भी उन्होंने अपनी गायकी से श्रोताओं को विभोर किया।

राजकुमारदास संगीत की संभावनाशील सनसनी बनकर सामने आए। महज 12 साल के राजकुमार की प्रस्तुति जिसने भी सुनी, वह उनका मुरीद हुए बिना नहीं रह सका। नैसर्गिक सुरीलापन और कच्ची उम्र में ही शास्त्रीय संगीत की पक्की पकड़ उन्हें खास बनाती है। कक्षा सात के छात्र राजकुमार स्कूली संगीत प्रतियोगिताओं में भी श्रेष्ठता की छाप छोड़ रहे हैं।

Posted By: Jagran

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