अयोध्या : प्रस्तावित राममंदिर के निर्माण से पूर्व 40 फीट गहराई तक सतह की मिट्टी हटाई जाएगी। इस काम में दो से ढाई महीने का समय लगने का अनुमान है। इस अवधि में जहां नींव निर्माण की योजना को अंतिम रूप दिया जाएगा, वहीं निर्माण में प्रयुक्त होने वाले पत्थर और अन्य सामग्री का भंडारण चलता रहेगा। ताकि अपेक्षित गहराई तक सतह खनन के बाद निर्माण कार्य अविलंब शुरू किया जा सके। मंदिर निर्माण की यह दिशा राम मंदिर निर्माण समिति की दो दिवसीय बैठक के बाद प्रशस्त हुई। निर्माण समिति के अध्यक्ष एवं अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहे सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी नृपेंद्र मिश्र की अध्यक्षता में पांच सत्रों तक चली बैठक का समापन शुक्रवार को सायं चार बजे हुआ। सर्किट हाउस के सभागार में हुई बैठक मीडिया कर्मियों के लिए निषिद्ध थी। बैठक के बारे में जानकारी सभागार से बाहर निकले रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविददेव गिरि एवं महासचिव चंपतराय ने दी। स्वामी गोविददेव के अनुसार प्रस्तावित गहराई तक मिट्टी हटाए जाने के लक्ष्य के अनुरूप अभी तक तीन मीटर तक मिट्टी हटाई जा चुकी है, अगले कुछ दिनों में दो मीटर मिट्टी और हटाई जाएगी। इसके बाद विशेषज्ञ राय देंगे तो 12 मीटर गहराई तक मिट्टी हटाई जाएगी। उन्होंने निर्माण की गति पर संतोष व्यक्त करते हुए बताया कि अगले साढ़े तीन साल में मंदिर निर्माण का काम पूर्ण कर लिया जाएगा। चंपतराय ने भी बैठक के नतीजे पर खुशी जताई और बताया कि मलबा हटाए जाने का चरणबद्ध काम चलेगा और जरूरत के हिसाब से कुछ काम एक-एक कर और कुछ काम साथ-साथ चलेंगे। उन्होंने बताया कि बैठक में तीन माह, छह माह और एक साल की चरणबद्ध योजना तय की गई है। इसी के साथ संपूर्ण निर्माण कार्य को समय से पूरा किए जाने की भी नीति तय की गयी। बैठक में तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य एवं अयोध्या राजपरिवार के मुखिया बिमलेंद्रमोहन मिश्र तथा डॉ. अनिल मिश्र, प्रस्तावित मंदिर के मुख्य शिल्पी सीबी सोमपुरा के प्रतिनिधि के रूप में उनके पुत्र आशीष एवं निखिल सोमपुरा, ट्रस्ट की ओर से नामित प्रख्यात वास्तुविद जगदीश एस आफरे सहित मंदिर निर्माण की कार्यदायी संस्था एल एंड टी तथा टाटा कंसल्टेंसी इंजीनियर्स के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

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नींव के रूप में संपूर्ण परकोटा पाषाण खंडों से होगा आच्छादित

रघुवरशरण, अयोध्या

राम मंदिर के लिए नींव की ड्राइंग भले ही 15 दिन बाद तैयार होनी हो, पर यह तय हो गया है कि नींव का निर्माण पाषाण की विशाल इमारतों की पारंपरिक नींव निर्माण शैली में होगा, जिसे तकनीकी भाषा में कांटीन्युअस राफ्ट स्टोन प्रणाली कहा जाता है। इस प्रणाली के अनुसार प्रस्तावित मंदिर का संपूर्ण पांच एकड़ का परकोटा विशाल पाषाण खंडों से आच्छादित किया जाएगा और इसे स्थापित करने के लिए ही परकोटे की संपूर्ण सतह 12 मीटर यानी 40 फीट गहराई तक खोदा जा रहा है। मिट्टी की जगह पाषाण खंडों को स्थापित किया जाना है। पाषाण खंड आपस में किस मसाले से जोड़े जाएंगे, इसका अध्ययन आईआईटी मुंबई की लेबोरेट्री में चल रहा है और इस अध्ययन को अंतिम रूप देने में आईआईटी मुंबई के साथ आईआईटी चेन्नई सहित एलएंडटी तथा टाटा कंसल्टेंसी इंजीनियर्स के विशेषज्ञ शामिल हैं। समझा जाता है कि नींव की ड्राइंग तैयार होने के साथ नींव के पाषाण खंडों को आपस में जोड़ने वाले मसाले की रूपरेखा भी तय कर ली जाएगी। यह दिन मंदिर निर्माण की दिशा में बेहद अहम साबित होगा। नींव के पत्थरों को जोड़े जाने का मसाला तय होने के बाद निर्माण के दिशावाहकों को पीछे देखने की जरूरत नहीं रह जाएगी और वे निर्बाध गति से तय समय सीमा को ध्यान में रख कर निर्माण की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे।

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