अयोध्या : राममंदिर के दावे से जुड़े किरदार एक-एक कर दुनिया से कूच करते जा रहे हैं पर मंदिर निर्माण दूर की कौड़ी बना हुआ है। मंदिर आंदोलन से जुड़े रामानंदाचार्य स्वामी हंसदेवाचार्य का मार्ग दुर्घटना में शुक्रवार को निधन इस विडंबना को नए सिरे से कुरेद गया। मंदिर आंदोलन के पर्याय रहे रामचंद्रदास परमहंस 31 जुलाई 2003 को ही 92 वर्ष की उम्र में चिरनिद्रा में लीन हो गए। प्रभावी वक्तृत्व और मंदिर आंदोलन के लिए स्वयं को दांव पर लगाने का जज्बा रखने वाले परमहंस मंदिर आंदोलन की अगली पंक्ति के नेता थे। 1949 में रामलला के प्राकट्य के समय से ही वे मंदिर निर्माण की मुहिम के संवाहक थे। चिरनिद्रा में लीन होने से सवा वर्ष पूर्व ही उन्होंने शिलादान के माध्यम से मंदिर निर्माण का गंभीर प्रयास किया था। तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ भी मंदिर आंदोलन के अग्रणी नायकों में शुमार थे। उन्होंने भी ऐसे अनेक अभियानों का नेतृत्व किया, जो मंदिर निर्माण के मकसद से संचालित थे पर उनका मकसद नहीं पूरा हुआ और 12 सितंबर 2014 को करीब 90 वर्ष की अवस्था में उनकी उम्र पूरी हो गई। अशोक ¨सहल की गणना मंदिर आंदोलन के मुख्य शिल्पी के तौर पर होती रही। उन्होंने प्राणप्रण से मंदिर आंदोलन को कामयाब बनाने का प्रयास किया और ऐसे अनेक संकल्प-विकल्प आजमाते रहे, जिससे मंदिर निर्माण संभव होता पर 17 नवंबर 2015 को मृत्यु के आगे उनका भी इंतजार थम गया। निर्मोही अखाड़ा के सरपंच रहे महंत भास्करदास भी अदालत में प्रबल पैरोकारी के माध्यम से मंदिर की दावेदारी के पर्याय रहे। बढ़ती उम्र के साथ उनका एक-एक दिन मंदिर निर्माण की प्रतीक्षा में गुजर रहा था पर 16 सितंबर 2017 को मंदिर निर्माण की अधूरी साध लिए वे भी चल बसे। उनके शिष्य एवं उत्तराधिकारी महंत रामदास के अनुसार मंदिर निर्माण की उनकी साध भले ही पूरी नहीं हुई पर वे अपने पीछे मंदिर निर्माण की प्रबल प्रेरणा दे गए।

Posted By: Jagran

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