जागरण संवाददाता, चित्रकूट : दो अक्टूबर को जिले को ओडीएफ घोषित करने का ख्वाब अधूरा होता दिखाई दे रहा है। कारण है कि 21 हजार 887 पुराने शौचालय जियो टैगिंग न होने से गायब हो गए हैं। जिला पंचायत राज विभाग के अफसरों को ये शौचालय खोजने से भी नहीं मिल रहे हैं। अब तो ऐसा लगा रहा है कि इन शौचालयों को कागजों पर ही बनाकर रिपोर्ट बना दी गई है।

प्रधानमंत्री ने वर्ष 2014 से शौचालय निर्माण में जोर देने की शुरुआत की थी। इससे पहले शौचालय निर्माण कार्य वर्ष 2012 से जिले में शुरू हो गया था। उस समय शौचालय के नाम पर जमकर लूट हुई। ग्राम पंचायतों के माध्यम से प्रधानों और सचिवों ने शौचालय के अधूरे निर्माण के बाद ही रुपये निकाल लिए। कुछ जगह कागजों पर सब कुछ बना दिया गया, लेकिन हकीकत इसके इतर है। अब यही शौचालय अफसरों के गले की फांस बन गए हैं। वर्ष 2012-13 से 2018-19 तक करीब सवा लाख शौचालयों का (एमआइएस) पैसा लाभार्थियों के खाते में भेजा जा चुका है। वहीं, वर्ष 2014 से अब तक जियो टै¨गग का आंकड़ा 50 फीसद भी नहीं पहुंचा है।

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जिले में स्वच्छ भारत मिशन एक नजर में

बेस लाइन सर्वे में शौचालय के लिए चिह्नित परिवार : 1,53,570

वह परिवार जिनको मिला शौचालय : 1,31,683

एमआइएस परिवारों की संख्या : 1,18,171

जियो टै¨गग की जा सकी : 41,356

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पुराने शौचालयों को खोजने में थोड़ी दिक्कतें हो रही हैं। स्वच्छ भारत मिशन के साफ्टवेयर में एक लाभार्थी को दो बार लाभ नहीं मिल सकता है। इसलिए पुराने को नया शौचालय बनाने के लिए धनराशि नहीं दी जाएगी। पुराने कुछ जगह शौचालय बने ही नहीं हैं। इसकी जांच कराई जा रही है।

-सुरेश चंद्र मिश्रा, जिला पंचायत राज अधिकारी, चित्रकूट

Posted By: Jagran