जासं, सैयदराजा (चंदौली) : संकट काल में गैर प्रांत व महानगरों में मेहनत-मजदूरी कर पेट पालने वाले गरीब मजदूरों की वापसी का सिलसिला जारी है। बुधवार को क्षेत्र के नौबतपुर बार्डर पर दर्जनों मजदूरों का जत्था अपने घर बिहार जाते दिखा। इसमें शामिल प्रमिला देवी की हालत देखकर तरस आ रहा था। कांधे पर गठरी व गृहस्थी लादे आठ वर्षीय बेटी और 10 वर्षीय बेटे के साथ बिना चप्पल के पैदल ही सैकड़ों मील के सफर पर निकली हैं। बीच रास्ते मजदूरों का साथ मिला तो साहस बढ़ गया, लेकिन बिहार सरकार की बदइंतजामी को लेकर नाराजगी दिखी।

अपनी वेदना बताते समय फफक पड़ीं। बताया हरियाणा प्रांत के करनाल जनपद में रहकर मेहनत-मजदूरी कर अपना और बच्चों का पेट पालती थीं। वैश्विक महामारी के चलते काम-धंधा ठप हो गया। ऐसे में बिहार के पटना के समीप स्थित गांव जाने के अलावा अब और कोई विकल्प नहीं है। सोचा था लॉकडाउन खत्म होने के बाद काम दोबारा शुरू होगा और कमाई होने लगेगी। इसी इंतजार में करनाल में काफी दिन गुजार दिए। वहां रहने में जमापूंजी खत्म हो गई। अब पैसा नहीं बचा है। ऐसे में पैदल ही बच्चों के साथ घर के लिए निकल पड़ी हैं। 15 दिनों में हजार किलोमीटर की यात्रा कर थक चुकी हूं। 15 दिन में 1000 किमी की यात्रा पैदल तय कर चुकी हूं। अन्य मजदूरों ने बताया कि उनके साथी भी पैदल ही सफर कर घर पहुंचे हैं। जो लोग बिहार में सुशासन बाबू की प्रशंसा करते नहीं थकते थे, उन्हें कोरोना संक्रमण ने आईना दिखाने का काम किया है। उत्तर प्रदेश काफी बड़ा राज्य होने के बावजूद यहां सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति काबिले तारीफ है। यहां की सरकार ने मजदूरों को वापस लाने के लिए ट्रेनों और वाहनों की व्यवस्था की है। इससे काफी राहत मिल रही है। बिहार सरकार को भी इससे प्रेरणा लेनी चाहिए।

Posted By: Jagran

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