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Chandauli: सपा से कड़ी टक्कर में ‘सहयोगियों’ के सहारे भाजपा की हैट्रिक, चंदौली लोकसभा सीट की ग्राउंड रिपोर्ट

सपा गठबंधन भी महंगाई बेरोजगारी जैसे मुद्दों के साथ ही पिछड़ेपन से जूझ रहे क्षेत्र में कोई भारी उद्योग न लगाने पर डॉ. पाण्डेय को घेरते हुए भाजपा की हैट्रिक पर ब्रेक लगाने की कोशिश में है। अबकी बसपा बेअसर है। चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में सभी दलों के बड़े नेता यहां सियासी हवा का रुख अपनी ओर मोड़ने को ताबड़तोड़ जनसभाएं करने में जुटे हैं।

By Ajay Jaiswal Edited By: Shivam Yadav Published: Wed, 29 May 2024 07:46 PM (IST)Updated: Wed, 29 May 2024 07:46 PM (IST)
Chandauli: सपा से कड़ी टक्कर में ‘सहयोगियों’ के सहारे भाजपा की हैट्रिक।

आम चुनाव के अंतिम चरण की हाई प्रोफाइल लोकसभा सीटों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से बिल्कुल सटी चंदौली लोकसभा सीट भी है। यहां से मोदी सरकार में पहले कौशल विकास और अब भारी उद्योग मंत्रालय का दायित्व संभाल रहे डॉ. महेन्द्र नाथ पाण्डेय एक बार फिर चुनाव मैदान में है। विपक्षी गठबंधन आईएनडीआईए से सपा ने पूर्व मंत्री वीरेंद्र सिंह को चुनावी अखाड़े में उतारा है। जातीय चक्रव्यूह में घिरी चंदौली सीट पर मोदी-योगी के नाम व काम के प्रभाव के साथ ही भाजपा एनडीए के सहयोगी दलों के दम पर सीधी लड़ाई में विपक्षी गठबंधन की धार को कुंद करते दिख रही है। 

सपा गठबंधन भी महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों के साथ ही पिछड़ेपन से जूझ रहे क्षेत्र में कोई भारी उद्योग न लगाने पर डॉ. पाण्डेय को घेरते हुए भाजपा की हैट्रिक पर ब्रेक लगाने की कोशिश में है। अबकी बसपा बेअसर है। चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में सभी दलों के बड़े नेता यहां सियासी हवा का रुख अपनी ओर मोड़ने को ताबड़तोड़ जनसभाएं करने में जुटे हैं। पेश से चंदौली लोकसभा क्षेत्र से राज्य ब्यूरो प्रमुख अजय जायसवाल की ग्राउंड रिपोर्ट:-

पूर्वांचल में वाराणसी से बिहार सीमा तक लगने वाली चंदौली लोकसभा सीट का ज्यादातर हिस्सा ग्रामीण है। ‘धान का कटोरा’ कहे जाने वाले चंदौली क्षेत्र को 27 वर्ष पहले मायावती ने वाराणसी से अलग कर जिला बनाया था। तकरीबन 18,36,000 मतदाताओं वाला चंदौली आज भी पिछड़ेपन से उबरा नहीं है। यहां के ज्यादातर निवासी खेती पर निर्भर है लेकिन सिंचाई के पर्याप्त साधन नहीं है। 

बुनियादी सुविधाओं का हाल भी बदतर है इसलिए क्षेत्रवासियों की नाराजगी जनप्रतिनिधियों के प्रति देखने को मिलती है। हालांकि, सिंचाई के साधन से लेकर पिछड़ेपन को दूर करने को चुनाव में विकास के मुद्दे पर जातीय समीकरण कहीं ज्यादा हावी है। तकरीबन 25 फीसद वंचित समाज के साथ ही क्षेत्र में पिछड़े वर्ग से यादव, राजभर, निषाद-बिंद, पटेल-कुर्मी, मौर्य-कुशवाहा बिरादरी का दबदबा है। ब्राह्मण और क्षत्रियों के भी ठीक-ठाक वोट हैं। मुस्लिम आबादी 10 प्रतिशत से भी कम है।  

चंदौली लोकसभा सीट की पांच विधानसभाओं में मुगलसराय, सकलडीहा, सैयदराजा के साथ ही वाराणसी जिले की शिवपुर और सुरक्षित सीट अजगरा है। वर्तमान में चार विधानसभा सीटों पर भाजपा और सकलडीहा पर सपा का कब्जा है। इस बार सपा-कांग्रेस साथ है तो बसपा अकेले। भाजपा ने जहां फिर डॉ. महेन्द्र पाण्डेय पर दांव लगाया है वहीं सपा ने अबकी पूर्व मंत्री वीरेंद्र सिंह को मैदान में उतारा है। बसपा से सत्येन्द्र कुमार मौर्य मैदान में हैं। 

गौर करने की बात यह है कि अपना दल(एस) के साथ ही सुभासपा, निषाद पार्टी के भी एनडीए में शामिल होने और जनवादी पार्टी के संजय चौहान का समर्थन मिलने से इस बार जहां भाजपा जातीय समीकरण साधने में कामयाब दिख रही है वहीं, मोदी-योगी सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर कराए गए विकास कार्यों का प्रभाव खासतौर से शिवपुर व अजगरा सीट पर है। 

राम मंदिर का निर्माण व मुफ्त अनाज जैसी योजनाओं का असर तो पूरे संसदीय क्षेत्र में है। गौर करने की बात यह है कि योगी सरकार में सुधरी कानून-व्यवस्था के साथ ही माफिया मुख्तार अंसारी की मौत की चर्चा से भी पार्टी यहां से हैट्रिक लगाने की राह पर है।

दूसरी तरफ विधायक से लेकर मंत्री तक रहे सपा उम्मीदवार वीरेंद्र सिंह पूर्व में कांग्रेस और बसपा भी रहे हैं। गठबंधन होने से सपा के साथ ही कांग्रेसी भी वीरेंद्र सिंह की जीत के लिए पसीना बहाते दिख रहे हैं। वाराणसी के ही रहने वाले वीरेंद्र क्षेत्रवासियों के लिए अनजान नहीं हैं। उनके कई कालेज व दूसरे कारोबार इसी क्षेत्र में हैं। यादव-मुस्लिम के साथ ही कुछ हद तक राजपूतों का झुकाव उनकी ओर दिखता है। 

महंगाई व बेरोजगारी से क्षेत्र के निवासियों में भाजपा के प्रति नाराजगी है। भारी उद्योग मंत्री होने के बावजूद क्षेत्र में कोई बड़ा उद्योग न लगवाने और संसदीय क्षेत्र में कम सक्रियता से डॉ. पाण्डेय के प्रति भी लोगों की नाखुशी है। क्षेत्रवासियों का तो यहां तक कहना है कि सांसद ही नहीं भाजपा विधायक भी जीतने के बाद बुनियादी सुविधाओं की बदहाली दूर करते नहीं दिखते।

अजगरा के हरहुआ में कोईराजपुर मोड़ पर बात करें अशोक सिंह और सोपाल पाण्डेय बताते हैं कि वे महेन्द्र पाण्डेय को तो नहीं चाहते हैं, लेकिन मोदी-योगी की मजबूरी में वे ‘कमल’ के साथ हैं। कहते हैं कि भाजपा ने प्रत्याशी बदल दिया होता तो उसे कोई दिक्कत ही नहीं थी। 

अजय सिंह कहते हैं कि न सांसद न विधायक टी राम यहां कुछ करते हैं फिर भी मोदी-योगी सरकार के काम को देखते हुए उन्हें ही जनता वोट देगी। कारसेवकों पर गोली चलवाने के लिए सपा को कोसते हुए काशी सिंह कहते हैं कि चंदौली न सही किसी भी उद्योग लगाए जाने में भी तो राष्ट्र का भला है। सिद्धांत नहीं स्वार्थ में वीरेंद्र पार्टी बदलते रहे जबकि बेदाग छवि के डॉ. पाण्डेय भाजपा के ही सिद्धांतों पर चलने रहे हैं। ऐसे में मुझे जाति देखनी होती तो योगी की देखेंगे। 

सोनू यादव भाजपा से इसलिए नाराज हैं कि पेपर लीक होने से अब तक वे बेरोजगार हैं। शिवपुर में मिठाई के कारोबारी अशोक गुप्ता कहते हैं कि आएंगे तो मोदी ही। भवानीपुर के कोटवा में पान की दुकान पर खड़े बनारसी साड़ी बनाने वाले बाबूद्दीन कहते हैं कि मुफ्त राशन तो मिलता है लेकिन महंगाई से परिवार पालना मुश्किल है। संजय सवाल उठाते हैं कि दो किलो गेहूं व तीन किलो चावल से कैसे महीनेभर पेट भरेगा?

बीरापट्टी के विनोद यादव दावे के साथ कहते हैं अबकी भाजपा ही नहीं बसपा का वोट भी वीरेंद्र को ही मिलेगा। दल्लीपुर में दूध का कारोबार करने वाले मणि और ललितेश पाण्डेय समझाते हैं कि उनके यहां वंचित समाज के काम करने वालों को लगता है कि भाजपा से संविधान को संकट है इसलिए वे मुफ्त राशन-मकान मिलने पर भी भाजपा के साथ नहीं है। आकाश आनंद को रैलियों से रोकने पर वंचित समाज को लगता है कि मायावती भी भाजपा से मिली हुई हैं इसलिए उनके ‘हाथी’ का बटन दबाने वाले भी इस बार कम होंगे। 

चौबेपुर के अरविन्द्र चौबे कहते हैं कि वाराणसी में मोदी की तरह यहां महेन्द्र पाण्डेय ने काम पर ध्यान दिया होता तो उनकी जीत को कोई रोक न पाता। भगतुआ में किराने की दुकान खोले राजकुमार बरनवाल को शिकायत है कि सांसद इधर आते ही नहीं। सकलडीहा के चहनियां चौराहे पर मिले अमन यादव कहते हैं कि न अस्पताल खुला है और न ही स्टेडियम यहां बना है। वर्षों से चंदौली-गाजीपुर हाईवे का काम भी लटका है। 

सयैदराजा के एवेती गांव में रहने वाले अशोक पाण्डेय व महानंद चौबे योगी सरकार से इसलिए खुश हैं, क्योंकि माफिया अतीक व मुख्तार की मौत से बड़े से बड़े अपराधी के हौसले पस्त हैं। मुगलसराय के रोहित, अरुण सिंह कहते हैं कि इस क्षेत्र से भाजपा को बड़ी जीत मिलती रही है लेकिन इस बार पहले जैसी स्थिति नहीं है। 

सांसद के प्रति नाराजगी जताते हुए कहते हैं कि 10 वर्ष निष्क्रिय रहे महेन्द्र पाण्डेय के बजाय किसी और मौका मिलता तो पार्टी के लोग भी चुनाव में ज्यादा सक्रिय दिखाई देते। एलबीएस कटरा में मेडिकल स्टोर खोले कैलाश सिंह कहते हैं यहां तो छोटे-छोटे विकास के कार्य भी नहीं हो रहे। बस स्टैंड तक है नहीं मुगलसराय में।  

वर्ष 2019 में 13,959 मतों के अंतर से ही जीती थी भाजपा   

एक दशक पहले वर्ष 2014 में मोदी लहर के साथ भाजपा ने चंदौली सीट पर अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) से गठबंधन कर 16 वर्ष बाद वापसी की थी।

भाजपा के डॉ. महेन्द्र नाथ पाण्डेय ने डेढ़ लाख से अधिक मतों के अंतर से बसपा को शिकस्त देकर जीत दर्ज की थी। दो लाख से अधिक मतों को लेकर सपा तीसरे व मात्र 27 हजार वोट पाने वाली कांग्रेस चौथे पायदान थी। 

पिछले चुनाव में सीट के सियासी समीकरण बदले थे। प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व संभालते दूसरी बार चुनाव मैदान में उतरे डॉ. पाण्डेय का मुकाबला सपा-बसपा गठबंधन के साथ ही सुभासपा से भी था। 

गठबंधन से सपा के टिकट पर जनवादी पार्टी के संजय सिंह चौहान लड़े थे, जबकि कांग्रेस ने बसपा सरकार में मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा की जन अधिकार पार्टी (जेएपी) के लिए सीट छोड़ दी थी। ऐसे में भाजपा-सपा की सीधी लड़ाई में डॉ. पाण्डेय सिर्फ 13,959 मतों के अंतर से ही जीते थे। 

उल्लेखनीय है कि चंदौली सीट पर भाजपा पहले भी हैट्रिक लगा चुकी है। वर्ष 1991, 1996 व 1998 चुनावों में भगवा परचम लहराया था। यहां से कांग्रेस, सपा व बसपा के भी सांसद रहे हैं लेकिन कोई भी दूसरी बार नही जीता है।   

2019 का चुनाव परिणाम

प्रत्याशी-पार्टी-वोट (प्रतिशत में)

महेन्द्र नाथ पांडेय-भाजपा-5,10,733(47.02)

संजय सिंह चौहान-सपा-4,96,774(45.74)

शिवकन्या कुशवाहा–जेएपी-22,291(02.05)

राम गोविंद-सुभासपा-18,985 (01.75)


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