सहारनपुर, जेएनएन। भाई-बहन के अटूट प्रेम का बंधन सिर्फ रक्षासूत्र से ही नहीं होता। यह भावनाओं की ऐसी डोर है, जिसमें रिश्ते कभी न खुलने वाली प्रेम की गांठ से बंधे होते हैं। सहारनपुर जिले में एक विधवा बहन त्याग और समर्पण की ऐसी ही अनूठी मिसाल कर रही है। कम उम्र में मांग का सिंदूर उजड़ने के बाद उसने अपना घर नहीं बसाया, बल्कि नेत्रहीन भाई की राह की रोशनी बन गई। मजदूरी कर अपने भाई व बच्चों की दो जून की रोटी का इंतजाम ही उसकी जिंदगी का मकसद है।

गंगोह ब्लाक के ग्राम मोहड़ा के 65 वर्षीय सिघा कोरी जन्म से नेत्रहीन है। उसका एकमात्र सहारा उसकी छोटी बहन सावित्री है। सावित्री की शादी थाना बड़गांव के दल्हेड़ी गांव में हुई थी। कम उम्र में ही उसके पति की मौत हो गई। उसने अपनी फिक्र न कर नेत्रहीन भाई के बारे मे सोचा। अपने बच्चों को लेकर अपने भाई सिघा के पास आ गई। सिघा के पास खेती-बाड़ी की जमीन नहीं है। गुजर-बसर के लिए सावित्री खेतों में मजदूरी करने लगी। अपने भाई सिघा व बच्चों के जीवन को संवारने में लग गई। पहले भाई का मकान बनवाया। उसमें ग्राम प्रधान ने भी सहयोग किया। बाद में अपनी दोनों लड़कियों को कक्षा 12 तक पढ़ाया। आज भी सावित्री अपनी छोटी बेटी के साथ खेतों में मजदूरी कर पहले अपने भाई को रोटी खिलाती हैं। बाद में निवाला अपने मुंह में डालती है।

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सरकार से खफा

लॉकडाउन में भले ही सरकार ने गरीबों को फ्री राशन दिया हो, लेकिन सिघा को इस योजना में कोई लाभ नही मिला है। दिव्यांग पेंशन से भी वह वंचित है। हालांकि कुछ समय से वृद्धावस्था पेंशन मिलने लगी है।

ग्राम प्रधान मनोज शर्मा का कहना है कि सिघा का राशनकार्ड कट गया था। दोबारा बनवाने के लिए प्रयास किया जा रहा है। उसकी बहन का गरीबी रेखा का कार्ड बना हुआ है। पूर्ति निरीक्षक डॉ दीपा शंकर शर्मा ने बताया कि कार्ड न होना दुर्भाग्यपूर्ण है। ग्राम प्रधान से बात कर जानकारी ली जाएगी।

Posted By: Jagran

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