बिजनौर, टीम जागरण। नजीबाबाद में आजाद भारत में संविधान को मजबूती देने वाली सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक समरसता की भावना को नजीबाबाद में बल मिल रहा है। एक ही छत के नीचे विभिन्न धर्मों के लोग न केवल धार्मिक आजादी के साथ जीते हैं, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुख में स्वजन की तरह भागीदार बनते हैं। आज जब हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, तो ऐसे में प्रेमधाम आश्रम की ओर ध्यान खिचा चला जाता है। प्रेमधाम आश्रम के संस्थापक फादर शिबू थामस और फादर बेनी तकेकरा भारतीय संस्कृति को आत्मसात कर सांप्रदायिक सद्भाव और सामाजिक समरसता की मिसाल बने हैं।

वर्ष 2009 में कोटद्वार मार्ग पर चार दिव्यांग बच्चों के साथ प्रेमधाम आश्रम की शुरुआत हुई थी। आश्रम संचालकों की निस्वार्थ सेवा और दिव्यांगों को आत्मनिर्भर कर आगे बढ़ाने की सोच को समाज के विभिन्न वर्ग के लोगों का समर्थन मिला। मात्र 13 वर्षों में शारीरिक और मानसिक रूप से अस्वस्थ 154 सदस्य आश्रम की सेवाओं का लाभ ले रहे हैं। इनमें हिदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई धर्म को मानने वाले शामिल हैं। सभी सदस्य एक-दूसरे की धार्मिक भावनाओं को सम्मान देते हैं। किसी सदस्य की मृत्यु हो जाने पर उसके धर्म से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार अंतिम क्रिया की जाती है।

-इनका कहना है

दिव्यांगजन समाज का अभिन्न अंग हैं। इन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत करने के साथ ही व्यावसायिक प्रशिक्षण देना हमारा लक्ष्य है। विभिन्न आयु वर्ग के कई सदस्य इसमें सफल भी हुए हैं।

-फादर शिबू थामस

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इनका कहना है

भारत की गंगा जमुनी सभ्यता अनेकता में एकता का संदेश देती है। सामाजिक कार्यों और दिव्यांगों की सेवा के बीच इसी भावना को आत्मसात कर हम आगे बढ़ रहे हैं। इसमें समाज, प्रशासन और मीडिया का भरपूर सहयोग मिला है।

- फादर बेनी तकेकरा

Edited By: Jagran