हिंदी दिवस: चंद्रशेखर आजाद को पढ़ाने वाले धर्मवीर सिंह ने देश को बताया अंग्रेजी और फारसी शब्दों का अर्थ
बिजनौर जिले और यहां के विद्वानों का हिंदी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है, जिसमें मानक स्वरूप को कौरवी बोली से जोड़ना शामिल है।

HighLights
बिजनौर का हिंदी के मानक स्वरूप में महत्वपूर्ण योगदान।
धर्मवीर सिंह ने चंद्रशेखर आजाद को भी पढ़ाया था।
अंग्रेजी पुस्तकों और तकनीकी शब्दों का हिंदी अनुवाद किया।
जागरण संवाददाता, बिजनौर। हिंदी के विकास में जिले और यहां के विद्वानों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वर्तमान में हिंदी का जो मानक स्वरूप भारत सरकार के द्वारा मान्यता प्राप्त है, वह भी जिला बिजनौर की बोली कौरवी से सबसे अधिक मिलता जुलता है।
आजादी से पहले हिंदी राजकाज और शिक्षा की मुख्य भाषा नहीं थी। अंग्रेजी, उर्दू, फारसी अधिक प्रयोग की जाती थी। आजादी के बाद शिक्षा तथा राजकाज में भारतीय भाषा की आवश्यकता पड़ी।
उत्तर भारत में हिंदी इसके लिए सर्वथा उपयुक्त थी। उस समय अधिकांश शैक्षिक पुस्तकें अंग्रेजी में थीं। हिंदी माध्यम से पढ़ने के लिए इनका अनुवाद करना आवश्यक था। इसमें हिंदी तथा अंग्रेजी के गंभीर विद्वानों की समिति बनाकर दायित्व सौंपा गया।
बिजनौर के विद्वानों का बड़ा योगदान
इतिहासकार फीना निवासी हेमंत कुमार ने बताया कि जिला बिजनौर के विद्वानों का शैक्षिक पुस्तकों के क्षेत्र में अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करने में बहुत बड़ा योगदान रहा है।
जिले में शिक्षाविद मुंशीराम ने गुरुकुल कांगड़ी स्थापित किया था और यहां के विद्वानों से स्नातक तक की अंग्रेजी पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद कराया था।
यह अनुवाद हिंदी अंग्रेजी गणित आदि विभिन्न विषयों की पाठ्य पुस्तकों का कराया गया था। यहां की अनुवादित पुस्तकें देश- विदेश में खूब प्रसिद्ध हुईं। पाठ्य पुस्तकों के अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद में बिजनौर के विद्वान धर्मवीर सिंह का नाम भी अंकित है।
वाराणसी में चंद्रशेखर आजाद को भी पढ़ाया
वाराणसी और हरिद्वार का दौरा कर गहरा शोध करते हुए हेमंत कुमार ने अपनी पुस्तक डायरी के पदचिह्न में लिखा है कि ग्राम रतनगढ़ में जन्मे धर्मवीर सिंह गणित, अंग्रेजी और विज्ञान के बड़े विद्वान थे।
वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे। इन्होंने वाराणसी में चंद्रशेखर आजाद को भी पढ़ाया था। उत्तर प्रदेश सरकार ने पाठ्य पुस्तकों व राजकाज में हिंदी के शब्दों के प्रयोग के लिए वर्ष 1950 में समिति बनाई थी।
धर्मवीर सिंह को तकनीकी शब्दों के हिंदी अनुवाद की समिति में सदस्य बनाया था। धर्मवीर सिंह ने अनुवाद समिति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। धर्मवीर सिंह मेरठ में भी गणित के प्राध्यापक थे। उनके एक पुत्र यज्ञवलक्य आत्रेय वर्तमान में हरिद्वार में रहते हैं।
