जागरण संवाददाता, ऊंज (भदोही) : बहुत हो गया सरकार, अब तो मुक्ति दे दो। इस जीवन से अच्छा तो मौत ही बेहतर है। आश्रय स्थल का नाम देकर उन्हें कैद खाने में डाल दिया गया है। सर्द मौसम है, चहुंओर हरियाली फैली है लेकिन इसके बाद भी उनकी जुबान हरे चारे के लिए तरस गई है। सूखे पुआल के सहारे जीवन कटना मुश्किल हो गया है। तीन माह में ही उनकी हड्डियां दिखने लगी हैं। मांस मानों शरीर में है ही नहीं। पैरों में अब वह ताकत नहीं रह गई है, जो उनके दिनों-दिन क्षीण होते जा रहे शरीर का वजन संभाल सके। यह दर्द उन बेजुबानों की आंखों से छलकता दिखाई पड़ा, जिन्हें बेसहारा बताकर आश्रय स्थलों में डाल दिया गया है।

बेसहारा मवेशियों को लेकर मुख्यमंत्री बेहद गंभीर हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अस्थायी आश्रय स्थलों के निर्माण कराकर उन्हें सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। इसे लेकर जहां प्रति मवेशी 30 रुपये के बजट का प्रावधान कर दिया है तो भदोही के पिपरीस में स्थाई के साथ कुल 18 अस्थाई आश्रय स्थलों का निर्माण भी कराया गया है। अब इन आश्रय स्थलों की व्यवस्था को देखा जाय तो स्थिति पूरी तरह बदहाल दिख रही है। एक-दो आश्रय स्थलों को छोड़ दिया जाय तो अधिकतर में मवेशियों को भरपेट भूसा तक नहीं मिल पा रहा है। हरा चारा व खली-चूनी तो दूर की बात है। रविवार को डीघ ब्लाक क्षेत्र के रमईपुर में स्थित अस्थाई गोशाला में मवेशियों को मात्र सूखा पुआल डाल दिया गया था तो सफाई आदि की व्यवस्था भी नदारद दिखी।

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आश्रय स्थलों में 2200 मवेशी

- जिले में कुल 30 आश्रय स्थलों की स्थापना का लक्ष्य तय किया गया है। अभी तक स्थापित एक अस्थाई सहित कुल 18 आश्रय स्थलों में 2200 मवेशियों को रखा गया है। दावा चाहे जो हो लेकिन अधिकतर आश्रय स्थलों की स्थिति बदहाल है। इससे इतर खुले में बगैर किसी व्यवस्था के टहल रहे मवेशी पूरी तरह स्वस्थ नजर आ रहे हैं।

Posted By: Jagran

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