जागरण संवाददाता, ज्ञानपुर (भदोही) : पौराणिक एवं धार्मिक ग्रंथों में एक से बढ़कर एक जलाशयों के इतिहास मिलते रहे हैं। पर्यावरण संतुलन, जल संचयन के साथ ही साथ जीवों के जिदगी में जलाशयों की अहम भूमिका है। बावजूद इसके दशकों से मानव जाति इसके दुश्मन बन चुके हैं। अंधाधुंध तालाबों को पाटकर उसके बहुमंजिला भवन बना दिया जा रहा है। मानव तो किसी तरह से पेयजल की व्यवस्था कर लेता है लेकिन पशु-पक्षियों के लिए खतरा बन चुका है। शायद इसी को आत्मसात कर भदोही के उगापुर गांव निवासी हिछलाल तिवारी ने जलाशयों की सुरक्षा मन में ठान लिया। इसकी शुरूआत उन्होंने अपने गांव से ही की। वर्ष 1980 में गांव के ही कृष्णदेव सहित दस लोगों ने तालाब संख्या 774 को अपने नाम आवंटित करा लिया था। साथ ही तालाब पर दालान भी बनवा लिया था। तालाब को खाली कराने के लिए हिछलाल तिवारी ने 1990 में तहसील में शिकायत कर जंग छेड़ दी तो वह करीब 11 साल तक चुप नहीं बैठे। जल संरक्षण को लेकर उनकी कलम चलती रही। मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया। परिणाम यह हुआ कि जुलाई 2001 में सुप्रीमकोर्ट ने हिछलाल के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जो आज भी हिछलाल बनाम कमलादेवी समूचे भारत में नजीर बन चुका है। इस ऐतिहासिक फैसला के बाद देश के लाखों तालाबों के जीर्णोद्वार हो चुका है। अकेले भदोही में 400 से अधिक तालाबों को जीवन मिल चुका है।

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जल संरक्षण को लेकर

अब भी जारी है लड़ाई

हिछलाल तिवारी अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए गांव के ही एक कालीन कंपनी में काम करते थे लेकिन जल संरक्षण के लिए वह अपनी कुर्बानी भी देने को तैयार रहते हैं। उनका कहना है कि जिदगी के लिए जल बहुत ही जरूरी है। जल बगैर धरातल पर जीव, जंतु और पौधे नहीं रह सकते हैं। इसलिए उसकी सुरक्षा करना मानव जाति का परम धर्म है। इसी को मानकर इस लड़ाई को लड़ी थी। बताते हैं कि बच्चों को एक टाइम खिलाते थे लेकिन वकील को फीस जरूर देते थे। इधर दो साल से उम्र में ढलान होने के कारण लड़ाई ठंडा पड़ गया है लेकिन संक्रमण काल खत्म होते ही फिर काम शुरू किया जाएगा।

Edited By: Jagran