बस्ती:पवित्र रमजान के महीने में भूखे पेट रहकर अल्लाह की इबादत की जाती है । यह महीना सबसे पाक माना जाता है। इस महीने में जकात सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। गुरुवार को दसवां रमजान यानी रहमत का आज आखिरी दिन है। जब रोजा रखा जाता है, भूख और प्यास की शिद्दत में उसके हृदय में हर इंसान के लिए हमदर्दी का होना स्वाभाविक है । रोजा रखने वाले लोगों के मन मे गरीबों और भूखे लोगों के लिए दया भाव का विकास होता है । माह के शुरुआती दस दिन के बाद अगला दस दिन मगफिरत यानी गुनाहों की माफी का होता है। इक्कीसवीं रमजान से अंतिम तीसवें दिन तक जहन्नम की आग से बचाने के लिए रोजा रखा जाता है। दारुल उलूम अहले सुन्नत मंजरुल इस्लाम के प्रिसिपल हाफिज मोहम्मद रफीक ने बताया कि रमजान तमाम बुराइयों से बचाते हुए मानव जाति से प्रेम,सहयोग,सहानुभूति की सीख देता है । ताज मोहम्मद ने कहा कि रोजा इंसान को सभी बुराइयों से परहेज करने की सीख देता है। साबित अली ने बताया कि अल्लाह पाक ने पवित्र कुरआन में फरमाया है कि रोजा तमाम मुसलमानों पर फर्ज है। उन्होंने ने यह भी कहा कि रमजान के महीने में तमाम रोजेदार अपने को खाना और पानी से दूर रखते हुए रब की इबादत करते हैं। मोहम्मद खलील ने बताया कि इंसान अल्लाह से डरे और नमाज पढ़ें, जकात दे और रोजा रखे। यही उसकी तरक्की का सबसे सही रास्ता है। पवित्र माह रम•ान में माह में परशुरामपुर क्षेत्र के घूरनपुर गांव के 8 वर्ष के सैय्यद मोहम्मद अली ने अपना पहला रोजा रखा है। अली ने कहा कि रोजा रखने की प्रेरणा उन्हें उनकी अम्मी रईस फात्मा से मिली। कहते है कि घर वालों के साथ मैंने भी इस वर्ष रो•ा रखने की बात कही तो हमारे माता पिता मान गए। इससे मुझे काफी खुशी हासिल हुई। पहले दिन दोपहर तक तो खेलकूद में कट गया। दोपहर के बाद गर्मी की वजह से प्यास बहुत लगने लगी। बिजली भी नही रही जिसके कारण गर्मी ने कुछ तो परेशान किया फिर भी इस पाक महीने में घर वालों के साथ मस्जिद में जाकर नमा•ा अदा की। अब सबके साथ निर्धारित समय पर रोजा इफ्तार कर रहा हूं। दोपहर बाद मेरे पिता ने मुझको रुपये का हार पहनाया। अली के पिता सैय्यद इस्तेखार हुसैन दिल्ली में रहकर व्यवसाय करते है और मां घरेलू महिला हैं।

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Posted By: Jagran

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