बरेली (जेएनएन)। बिन पानी सब सून..यह बात हमें भूलनी नहीं चाहिए। पानी बचाने और कुदरत से मिले वर्षा जल को जल सहेजने के लिए अभी से कदम न उठाए तो बूंद-बूंद को तरसना पड़ेगा। बरेली मंडल के आठ विकास खंडों में पानी इस कदर पाताल में जा पहुंचा है कि भूगर्भ जल विभाग ने भी खतरे की घंटी बजा दी। यह ब्लॉक डॉर्क जोन से लेकर सेमीक्रिटिकल तक श्रेणी में आ चुके हैं।

हिमालयी रीजन उत्तराखंड से नजदीकी और तराई का क्षेत्र बरेली व मंडल के अन्य तीनों जिलों की पहचान सिंचित और जल उपलब्धता वाले जनपदों में होती है। कुदरत और धरती की इसी नेमत ने खेती से लेकर वनों के क्षेत्र को वरदान दिया। लेकिन दुरुपयोग और अतिदोहन हमें उस हालात में पहुंचने का संकेत दे रहे हैं जहां दक्षिण अफ्रीका का केपटाउन, अफ्रीकी देश नामीबिया, सोमालिया खाड़ी के जॉर्डन, सीरिया जैसे देश हैं।

जिलों का हाल-

बरेली

रामगंगा नदी के तीरे बसे शहर ने उद्योगों की दिशा में कदम बढ़ा तो जंगल कटते चले गए और पानी का अतिदोहन शुरू हुआ। महज दो दशक में ही जिले के रामनगर, आंवला विकासखंड अब खतरे वाले क्षेत्र में आ गए। रामनगर के रेतीखेड़ा में करीब 55 से 60 फीट तक गहराई में पानी पहुंच चुका है। शहरी क्षेत्र में बिहारीपुर, कोतवाली, कुतुबखाना, कोहड़ापीर, सिविल लाइंस क्षेत्र पानी के संकट से जूझने लगे हैं। कभी जल का स्त्रोत रही अरिल, देवरनिया और पीलिया नदी अपने ही अस्तित्व की तलाश में हैं।

पीलीभीत

तराई का जिला होने के कारण यहा भूमिगत जल स्तर 22 से 27 फुट पर है। लेकिन पीने लायक शुद्ध पानी की उम्मीदें 120 से 125 फुट गहराई जाने पर पूरी हो पा रही हैं। राजकीय कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शैलेंद्र सिंह ढाका के अनुसार जिले के दक्षिणी क्षेत्र में बीसलपुर व बिलसंडा विकास खंडों में भूजल स्तर में कमी आ रही है। हालांकि अभी डार्क जोन जैसे हालात नहीं हैं। दो दशक पहले तक यहा 12 से 15 फुट की गहराई पर पानी उपलब्ध था। यहा साठा धान की खेती को अगर नहीं रोका गया तो भूजल स्तर और नीचे खिसक जाएगा।

शाहजहापुर

अंधाधुंध दोहन के कारण भूगर्भ जलस्तर लगातार घटता जा रहा है। भूजल सबसे प्रमुख स्त्रोत नदियां सिकुड़ गई तो ज्यादातर तालाब सूख चुके हैं। साफ पानी के लिए 160 फिट पर बो¨रग करानी पड़ रही है। 150 लीटर प्रति व्यक्ति रोज पानी की जरूरत है, लेकिन 57 लीटर ही उपलब्ध है। छह वर्ष पहले कलान ब्लाक को डार्क जोन घोषित कर दिया गया था। हालाकि बाद में वहा सोक पिट व रिचार्ज पिट बनाकर स्थिति संभाली गई। न पानी सहेजने की दिशा में काम हुआ और न ही भूगर्भ जल बचाने में। पिछले दिनों डब्ल्यूडब्ल्यूएफ संस्था व विनोबा सेवा आश्रम ने कटरी क्षेत्र के आठ गावों में वाटर फिल्टर चैंबर बनवाए, जिनसे मैले पानी को परिशोधित कर कृषि उपयोग लायक बनाने का प्रयोग शुरू हुआ।

बदायूं

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बरेली मंडल का प्रवेश द्वार है यह शहर। लेकिन, मंडल में सबसे चिंताजनक हालात भी इसी जिले में हैं। कुल 18 में से सात ब्लॉक पानी के संकट वाली श्रेणी में आ चुके हैं तो अंबियापुर को डार्क जोन घोषित किया गया है। इस्लाम नगर, कादरचौक, सहसवान, उझानी भी क्रिटिकल यानी अतिसंवेदनशील ब्लॉक हैं। अंधाधुंध दोहन की मार से आसफपुर और बिसौली भी सेमीक्रिटिकल घोषित हो चुके हैं। यह हालात केवल इसलिए कि पानी तो खूब बहाया, लेकिन सोत, महावा और अरिल जैसी नदियों को न सहेज सके।

By Jagran