बरेली, जागरण संवाददाता। Sanskarshala 2022: राजकीय इंटर कालेज की प्रवक्‍ता डा. नमिता त्रिपाठी ने कहा कि रचनाओं के आदान-प्रदान को इंटरनेट ने काफी सुगम बनाया है, लेकिन इंटरनेट मीडिया की स्थिति पर विचार करना भी आवश्यक है। इससे व्यक्ति का सामाजिक दायरा बढ़ा है। यह भौगोलिक सीमाओं से बाहर जाकर दुनिया को समझने और उसके बारे में जानकारी इकट्ठा करने का साधन बना है। इसके दूसरे पहलू पर विचार करते हैं तो भयावह तस्वीर उभरकर सामने आती है।

इंटरनेट मीडिया से अवसाद समेत कई बीम‍ारियों ने लिया जन्‍म

डा. नमिता ने कहा कि लोग इंटरनेट मीडिया के समुद्र में इस स्तर तक डूबे हुए हैं, जहां से निकलना उनके लिए किसी स्वप्न सिद्धि से कम नहीं है। इंटरनेट मीडिया के अत्यधिक उपयोग से व्यक्तियों में तमाम अवसाद और व्याधियों ने जन्म ले लिया है। आज व्यक्ति अनिद्रा, डिप्रेशन और अकर्मण्यता का शिकार है। उसके कार्य उत्पादकता में भी कमी आई है। वह काम के समय में इंटरनेट मीडिया की ओर आकर्षित होकर अपने बहुमूल्य समय का दुरुपयोग कर रहे हैं।

कार्य छोड़कर इंटरनेट मीडिया पर समय बिता रहे लोग

तमाम सरकारी दफ्तरों और शैक्षणिक संस्थाओं में यह प्रवृत्ति देखी जा रही है। व्यक्ति अपने मूल दायित्व से विमुख होता जा रहा है। जब कोई विकृति बड़ी उम्र के साथ आपके जीवन में प्रवेश करती है तो उसका निदान समझदारी पूर्वक किया जा सकता है, लेकिन यदि इसी प्रकार की विकृति बाल मन से ही आपकी आदतों में सम्मिलित हो जाए तो उससे बाहर निकलना आसान नहीं होता।

इंटरनेट मीडिया के जाल में फंसी नई पीढ़ी

इंटरनेट मीडिया ने नई पीढ़ी को इस मोहपाश में जकड़ लिया है। इंटरनेट मीडिया के प्रभाव से किशोरों के बीच जिस प्रकार के अवसादों का जन्म हो रहा है, वो आने वाली पीढ़ियों के लिए ठीक नहीं हैं। आज के किशोर और युवा आभासी दुनिया में जी रहे हैं। मोबाइल फोन, गेमिंग और मीडिया प्लेटफार्म्स उनके शारीरिक और मानसिक विकास को अवरुद्ध कर रहे हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि माता-पिता और समाज युवाओं की इस विकृति को पहचान कर उसके निदान का प्रयास करें, अन्यथा आने वाले समय में हम एक अवसाद ग्रस्त और संवेदनहीन समाज का निर्माण करने की ओर अग्रसर हो रहे हैं।

युवाओं में बढ़ी अनावश्यक तुलना की प्रवृत्ति

इंटरनेट मीडिया के प्रभाव ने युवाओं में अनावश्यक तुलना की प्रवृत्ति को बढ़ाया है, जिससे ईष्या भाव का जन्म होता है। इस कारण युवाओं के बीच खुशी का एहसास कम है। इसके अत्यधिक प्रयोग ने युवाओं के दैनिक जीवन चर्या को भी अव्यवस्थित कर दिया है। वे देर से सोते और जागते हैं। इस कारण परिवार से उनका संपर्क कम हो गया है। इसलिए आज यह अति आवश्यक है कि हम अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ आवश्यक उपायों पर चर्चा करें जिससे इंटरनेट मीडिया की बुरी लत से छुटकारा पाया जा सके। युवाओं को इस बात के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए कि वह अनावश्यक तुलना से बचने का प्रयास करें। आभासी दुनिया से बाहर आकर वास्तविक जीवन शैली को अपनाएं।

बच्चों को प्रेरित करें अभिभाव

बड़े होते बच्चों के लिए इंटरनेट गैजेट्स के इस्तेमाल का समय निर्धारित करें और उनके सोने व उठने के क्रम को निश्चित करें। जब तक आवश्यक न हो, फोन को उनकी पहुंच से दूर रखें। बच्चों को प्रकृति से जोड़ने का प्रयत्न करें और साथ ही सामाजिक रूप से उनको सक्रिय बनाएं। उन्हें खेलों में हिस्सा दिलाएं, ताकि वह इंटरनेट मीडिया के जाल में उलझने के बजाय वास्तविक जीवन की ओर प्रेरित हों। उनको हार और जीत दोनों के महत्व को समझाएं और जीवन में इन दोनों पक्षों की सकारात्मकता को समझाने का प्रयास करें।

बच्‍चों को खेलकूद के प्रति करें प्रेरित

निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ी का वास्तविक जीवन में खेलकूद के मैदानों पर लौटना उनके शारीरिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक है। अपने सामाजिक परिवेश को समझना, बड़ों के प्रति आदर भाव और अपनी संस्कृति को समझना आवश्यक है, अन्यथा हम जाने-अनजाने में एक भयभीत और भ्रमित भारत के निर्माण की तरफ बढ़ जाएंगे। - डा. नमिता त्रिपाठी, प्रवक्ता, राजकीय इंटर कालेज

Edited By: Vivek Bajpai

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