बरेली, जेएनएन। रुहेलखंड की अनुपम नगरी बरेली का कण-कण अयोध्या में रामजन्म भूमि पर भगवान राम के मंदिर बनने से आह्लादित है। रुहेलखंड के घर-घर तक रामकथा को पहुंचाने का श्रेय पं. राधेश्याम कथावचक को ही जाता है। आज से 129 वर्ष पहले 25 नवंबर, 1890 को शहर के बिहारीपुर मुहल्ले में जन्मे पं. राधेश्याम कथावाचक के संदर्भ में यह पंक्तिया आज भी कही जाती हैं- समय-समय पर भेजते संतों को श्रीराम। वाल्मीकि तुलसी भए, तुलसी राधेश्याम।। वह रामकथा वाचक ही नहीं, अपितु युग दृष्टा थे। महामना मदनमोहन मालवीय उनके गुरु थे। पृथ्वीराज कपूर मित्र तो घनश्याम दास बिड़ला उनके परम भक्त थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र व मुंशी प्रेमचंद भी उनकी रचनाओं से प्रभावित रहे।

उनकी रामकथा वाचन शैली की ख्याति फैली तो पंडित मोतीलाल नेहरू ने उन्हें बुलाकर आनंद भवन में 40 दिन तक उनसे रामकथा सुनी। प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी राष्ट्रपति भवन में आमंत्रित कर उनसे 15 दिनों तक रामकथा का आनंद लिया था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए धन जुटाने महामना जब बरेली पधारे तो राधेश्याम ने उनको अपनी साल भर की कमाई उन्हें दान दे दी थी। पं. राधेश्याम ने उस दौर में रामकथा को इतना लोकप्रिय बना दिया कि राम उनके नाम के साथ ही जुड़ गए। लोक नाट्य शैली को आधार बनाकर खड़ी बोली में महज 17-18 वर्ष की आयु में सहज भाव से आठ काड और 25 खंडों में राधेश्याम रामायण की रचना की।

उनके जीवनकाल में ही हिंदी और उर्दू में भी इसकी करीब डेढ़ करोड़ से अधिक प्रतिया बिकीं। 1922 के लाहौर विश्व धर्म सम्मेलन का शुभारंभ उन्हीं के लिखे व गाए मंगलाचरण से हुआ था। नेपाल नरेश ने 1937 में उनको कथा वाचस्पति की उपाधि से सम्मानित किया था। केंद्र सरकार की ¨हदी सलाहकार समिति के पूर्व सदस्य डॉ. श्वेतकेतु शर्मा बताते हैं कि पं. राधेश्याम ने रामायण के माध्यम से बालकांड, अयोध्या कांड, अरण्य काण्ड, किष्किंधा कांड, सुंदरकांड, लंका कांड, उत्तर कांड तथा अंत में लवकुश कांड का भी भाव-विह्वल कर देने वाला चित्रण किया है।

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