अशोक आर्य, बरेली : वरिष्ठता का लाभ मिला तो साहब कुर्सी पर बैठ गए। वर्षों से एक ही काम करने के बाद अचानक प्रशासनिक जिम्मेदारी, किसी पहाड़ पर चढऩे से कम न थी। मन दुविधा में था, किसी भंवर में फंसने जैसी स्थिति थी। झंझावतों से मन पार लगाने को दो खेवनहार मिले। साथ बैठे तो राजपाट चलने लगा। कभी कोई बात होती तो धीरे से इशारा मिल जाता। साहब बोलते तो कुछ नहीं, हां लंबा-चौड़ा कागज जरूर जारी कर देते। कम बोलने की उनकी आदत कई बार परेशानी में भी डाल गई। डीएम निरीक्षण को आए तो यही आदत सारी व्यवस्थाओं को दबा गई। नतीजा यह हुआ कि बैठक में नहीं आने पर साहब के वेतन कटने तक की नौबत आ पहुंची। साथियों के साथ व्यवहार ठीक है, लेकिन उन्हें बिना बताए पार्किंग की पर्ची चस्पा कर चालान कटवाना महंगा पड़ गया। सभी डॉक्टरों ने विरोध किया, साहब सिर नीचे किए सुनते रहे।  

डॉक्टर साहब लौटे नहीं

साठ वर्ष से अधिक उम्र हो चुकी। दिल के मरीज भी हैैं। सरकारी सेवा से रिटायर हुए करीब दो साल हो गए मगर, बच्चों के डॉक्टर डॉ. श्रीकृष्णा का घर में मन नहीं लगा। सरकार से अनुमति मांग ली। इजाजत मिली तो फिर जिला अस्पताल आना शुरू किया। उम्र के इस पड़ाव पर जब आराम करने का समय था, तो फिर काम पर लग गए। इसी बीच साथ के एक डॉक्टर रिटायर हो गए। काम का दबाव बढ़ गया। जो दूसरे थे, वे छुट्टी चले गए। मरीजों की भीड़ उनके चैंबर के आगे लगने लगी तो घर वाले दिन याद आ गए। अस्पताल वालों से कहा कि यह अच्छी बात थोड़े है कि सारा काम हम पर लाद दिया। साथ वाले दूसरे डॉक्टर छुट्टी मनाएं और हम मरीजों के बीच जूझे। दो दिन किसी तरह काटे, फिर बोले- मैं दिल का मरीज हूं। कहकर घर लौट गए, फिर नहीं लौटे।

हनक तो उनमें भी है

मिजाज में सख्ती यूं ही नहीं आती। ऊंची पहुंच और जबरदस्त पैठ रखनी पड़ती है। अगर कोई अपना प्रभावशाली पद पर हो तो फिर सोने पर सुहागा। बात अगर जिला अस्पताल की करें तो यहां एक वार्ड में जाने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है। कहीं साथ का कोई बंदा बीड़ी तो नहीं पी रहा या फिर गुटका खाकर पीक मारने की आदत तो नहीं। सबको पता है वार्ड इंचार्ज बख्शती किसी को नहीं हैं। चालान काटते देर नहीं करतीं। अगर तीमारदार उलझे तो सबक भी खूब सिखा देती हैैं। वार्ड में लंबे समय से मरीजों की देखभाल में जुटी हैैं। कई अधिकारी आए और चले गए। सब पर उनके प्रभाव का जादू खूब चला। अपनी बात हक और नियमों से मनवाना खूब आता हैैं उन्हें। पति पुलिस में हैैं तो हनक भी भरपूर है। अक्सर साथ वाले यही कहते हैैं कि जब वो हैं कोतवाल तो डर कैसा।

वीरप्पन वाली मूछें कब ?

कद काठी ठीक है जनाब की। सेना के अफसर भी रह चुके हैैं इसलिए रुआब बेमिसाल है। अफसरों के आदेश से कम, अपनी मर्जी से ज्यादा चलते हैैं। मन किया तो काम, नहीं तो फिर आराम। अपनी घोड़ा-गाड़ी और सिपहसलार भी साथ रहते हैैं। अलग ही रियासत के मालिक हैं। यह सब तो ठीक, चर्चाएं उनके गेटअप की खूब रहती हैैं। साल में मौसम भले चार बार बदलता हो लेकिन साहब हर माह गेटअप बदलते हैैं। कभी बिग बी की तरह कोट के अंदर गले में मफलर बांध लिया तो कभी जैजी बी की तरह स्टाइलिश अंदाज। चश्मे बदलने के शौकीन हैैं। मूंछों के तो क्या कहने। ये कभी सिंघम की तरह नीचे हो जाती है तो कभी बाला के अक्षय कुमार की तरह ऊंची। साथियों में उनका बदलता गेटअप ही पहचान बन गया है। कभी-कभार उनसे पूछ भी लेते हैैं कि डॉक्टर साहब वीरप्पन की तरह मूंछे कब रखोगे।

 

Posted By: Abhishek Pandey

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