जेएनएन, बरेली: इसे उनकी नियति कहें या फिर काल का क्रूर मजाक। ईट भट्ठे पर फंसी तीन बेटियों को पिता के अंतिम दर्शन का भी अवसर नहीं मिला। मां की ममता बेबसी की कैद में आज भी आंसू बहा रही है। उसे बेटियों का इंतजार है, लेकिन भट्ठा मालिक ने उनके बीच दीवार बना हुआ है। मां फोन करती है तो हर बार वह कुछ दिन में बेटियों को भेजने का आश्वासन तो देता है, लेकिन भेजता नहीं।

राजस्थान के भरतपुर स्थित एक ईट भट्ठे पर लॉकडाउन में भी काम चल रहा था। जिले के क्यारा ब्लॉक के इचौरिया की रहने वाली श्याम प्यारी ने बताया कि वह पति पप्पू, 22 वर्षीय बेटी गेंदा, 18 वर्षीय खुशबू, 13 वर्षीय सीमा, सबसे छोटी गीता, बेटे राम औतार और सर्वेश्वर के साथ वहां काम करती थी। सबकुछ ठीक चल रहा था। दस अप्रैल को अचानक पप्पू के पेट में दर्द उठा तो भट्ठा मालिक ने एक लाख रुपये देकर एक गाड़ी से पप्पू, श्याम प्यारी, राम औतार, सर्वेश्वर व गीता को वहां से इलाज कराने भेज दिया। गेंदा, खुशबू व सीमा को उसने जमानत के तौर पर वहीं रोक लिया। अगले ही दिन इलाज के दौरान पप्पू की मौत हो गई तो वह उसका शव लेकर इचौरिया चले आए, जबकि उसकी तीनों बेटियां वहीं फंसी रहीं। उनको पिता के अंतिम दर्शन का भी मौका नहीं मिला। वह वहीं रहकर पिता के इलाज में भट्ठा मालिक द्वारा दिए गए एक लाख रुपयों को काम कर चुका रही हैं। श्याम प्यारी ने कई बार भट्ठा मालिक को फोन कर तीनों बेटियों को भेजने की गुजारिश की। वह हर बार उनको भेजने का आश्वासन तो देता है, लेकिन भेजता नहीं। श्याम प्यारी के अनुसार अभी उसके 60 हजार रुपये ही चुकता हो पाया है। इसी कारण उसने बेटियों को रोक रखा है।

सता रही बेटियों की चिंता

भट्ठे पर फंसी श्याम प्यारी की तीन में से दो बेटियां बालिग हैं, जबकि तीसरी 13 साल की है। तीन दिन पहले बात हुई तो पता चला कि उनकी भी तबीयत खराब है। वह फोन पर बहुत घबराई हुई थीं और रो भी रही थीं। उसे बेटियों की चिंता सता रही है। भट्ठा मालिक ने एक बार फिर कुछ दिन में पास बनवाकर उनको भेजने का आश्वासन दिया है।

छोटा बेटा गया कमाने

घर की माली हालत ठीक नहीं है। दोनों बेटे काम की तलाश में निकले तो राम औतार को निराशा हाथ लगी। किसी तरह सर्वेश्वर को काम मिला तो वह मंगलवार को कमाने निकल गया।

Posted By: Jagran

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