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सूरजमुखी और सहजन का अनोखा कमाल: रुहेलखंड विवि की शोधार्थी ने खोजा मिट्टी को शुद्ध करने का सीक्रेट फॉर्मूला

Published: Fri, 18 Sep 2026 05:00 AM (IST)

रुहेलखंड विश्वविद्यालय की शोधार्थी अमिता ने सहजन से बने नैनो पार्टिकल्स का उपयोग कर सूरजमुखी की मिट्टी शुद्ध करने की ...और पढ़ें

प्रयोगशाला में शोध करते हुए शोधार्थी अमिता। सौ. स्वयं

प्रयोगशाला में शोध करते हुए शोधार्थी अमिता। सौ. स्वयं

HighLights

  1. शोध की विशेषता, नैनो पार्टिकल्स के निर्माण में नहीं हुआ किसी विषैले रासायनिक पदार्थ का उपयोग

  2. प्रदूषित भूमि को दोबारा उपजाऊ बनाने और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम आएगा शोध परिणाम

हिमांशु अग्निहोत्री, बरेली। औद्योगिक अपशिष्ट, खनन गतिविधियों और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से खेतों की मिट्टी में भारी धातुओं की मात्रा बढ़ रही है। इसमें उपजी फसल के सेवन से मानव स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है। इससे चिंतित महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय के पादप विज्ञान विभाग की शोधार्थी अमिता ने मिट्टी को शुद्ध करने का उपाय निकाला।

एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. विजय कुमार सिन्हाल के निर्देशन में उन्होंने तीन वर्ष शोध किया, जिसमें मोरिंगा (सहजन) से बने नैनो पार्टिकल्स को सूरजमुखी पौधे की जड़ में मिलाया और फूल पर स्प्रे किया।

इससे सूरजमुखी के मिट्टी की शुद्ध करने की क्षमता 2.5 गुना बढ़ गई, भारी धातुओं को फूल ने अवशोषित कर लिया। इससे मिट्टी फिर से अपने मूल रूप में लौटने लगी।

शोधार्थी अमिता के अनुसार, यह अध्ययन भारी धातुओं से प्रदूषित मिट्टी को प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से साफ करने की दिशा में नई संभावनाएं प्रस्तुत करता है।

इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जिंक आक्साइड नैनो पार्टिकल्स के निर्माण में किसी विषैले रासायनिक पदार्थ का उपयोग नहीं किया गया। इसके बजाय मोरिंगा की पत्तियों के अर्क से ग्रीन सिंथेसिस तकनीक के माध्यम से नैनो पार्टिकल्स तैयार किए गए।

इसके बाद इनका उपयोग सूरजमुखी के पौधों की फाइटोरेमेडिएशन क्षमता बढ़ाने को किया। फाइटोरेमेडिएशन वह प्रक्रिया है, जिसमें पौधे अपनी जड़ों के माध्यम से मिट्टी या पानी में मौजूद जहरीले तत्वों और भारी धातुओं को अवशोषित कर पर्यावरण को शुद्ध करते हैं।

हानिकारक रसायनों के स्तर को किया जाएगा कम

शोध के परिणामों में पाया गया कि मोरिंगा आधारित जिंक आक्साइड नैनो पार्टिकल्स से उपचारित सूरजमुखी के पौधों ने सामान्य पौधों की तुलना में लगभग 2.5 गुना अधिक भारी धातुओं का अवशोषण किया। इससे प्रदूषित मिट्टी की सफाई की क्षमता में वृद्धि दर्ज की गई।

यह तकनीक विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी हो सकती है जहां औद्योगिक अपशिष्ट, खनन गतिविधियों या रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी में सीसा, कैडमियम, क्रोमियम, निकेल, तांबा और जस्ता जैसी भारी धातुओं का स्तर बढ़ गया है।

मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा

भारी धातु प्रदूषण केवल मिट्टी की उर्वरता को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि फसलों के माध्यम से खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर मानव और पशु स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बन सकता है। ऐसे में कम लागत वाली ग्रीन नैनो टेक्नोलाजी और पौधों पर आधारित यह विधि भविष्य में कृषि भूमि के पुनर्वास तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रभावी विकल्प सिद्ध हो सकती है।

रसायनों का निस्तारण भी चुनौती

शोधार्थी ने यह भी स्पष्ट किया कि फाइटोरेमेडिएशन के बाद पौधों में भारी धातुएं जमा हो जाती हैं, इसलिए उनका सुरक्षित निस्तारण अनिवार्य है। दूषित पौधों को खुले में जलाना या पशुओं के चारे के रूप में उपयोग करना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि इससे विषैले तत्व दोबारा वातावरण और खाद्य श्रृंखला में पहुंच सकते हैं।

ऐसे पौधों के सुरक्षित प्रबंधन के लिए नियंत्रित भस्मीकरण व वैज्ञानिक तरीके से निपटान जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है। इन विधियों का उद्देश्य भारी धातुओं को स्थिर करना या सुरक्षित रूप से अलग करना है, ताकि वे भूजल, मिट्टी और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा न बनें।

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