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'मिट्टी बदली, रीति नहीं!' 30 साल पहले बरेली में रोपा था पौधा, आज 300 परिवारों की धड़कन बना 'कर्मा'

Published: Thu, 01 Oct 2026 04:48 PM (IST)

बरेली में झारखंड, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के लगभग 300 आदिवासी परिवारों ने प्रकृति उपासना का महापर्व कर्मा पूरे ...और पढ़ें

आदिवासी उत्थान कल्याण समिति की ओर से आयोजित कर्मा पूजा में अपनी प्रस्तुति देतीं युवतियां। जागरण

आदिवासी उत्थान कल्याण समिति की ओर से आयोजित कर्मा पूजा में अपनी प्रस्तुति देतीं युवतियां। जागरण 

HighLights

  1. कर्मा पूजा से जता रहे प्रकृति का आभार, मयूरनृत्य कर की खुशहाल जीवन की कामना

  2. आदिवासी उत्थान कल्याण समिति ने बरेली में रखी थी उत्सव की नींव

हिमांशु अग्निहोत्री, बरेली। शहर से हजारों किलोमीटर दूर अपनी जन्मभूमि छोड़कर आए आदिवासी परिवारों ने बरेली की धरती पर एक ऐसी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखा है, जो केवल एक त्योहार नहीं बल्कि प्रकृति, पहचान और पीढ़ियों को जोड़ने वाला भावनात्मक रिश्ता है।

बरेली स्थित शहनाई बरातघर में झारखंड, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल से जुड़े करीब 300 आदिवासी परिवार ने प्रकृति उपासना का महापर्व कर्मा पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया।

शहनाइ बरातघर में कर्मा पूजा के लिए तैयार हो रही युवतियां। जागरण

कर्मा वृक्ष के आसपास महिलाओं ने मंदार, नगाड़े घंटा व ढोल की थाप पर समूह नृत्य किया, उरांव, हो, संथाली व मुंडा बच्चों ने भी पारंपरिक गीतों पर प्रतिभा दिखाते हुए प्रकृति का आभार जताया।

कार्यक्रम की शुरुआत कर्मा वृक्ष की डाल की पूजा से हुई। अतिथियों के कान पर जौ लगाकर मंगलकामना की गई, जो आदिवासी संस्कृति में सुख, समृद्धि और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है।

शहनाइ बरातघर में आदिवासी उत्थान कल्याण समिति की ओर से आयोजित कर्मा पूजा में अपनी प्रस्तुति देतीं युवतियां। जागरण

रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों, मोरपंख से सजे मुकुट और मयूर नृत्य ने पूरे वातावरण को लोक संस्कृति के रंगों से भर दिया। वैसे यह पर्व 22 सितंबर को मनाया जाना था, लेकिन व्यस्तता और बच्चों का स्कूल होने की वजह से इसे रविवार को मनाया गया।

शहनाइ बरातघर में आदिवासी उत्थान कल्याण समिति की ओर से आयोजित कर्मा पूजा में अपने वाद्य यंत्रों के साथ नृत्य करते संस्था के लोग। जागरण

इसमें बरेली, पीलीभीत, पंतनगर और आसपास के जिलों से आए परिवारों ने एक स्वर में कहा कि बदलते समय में बच्चों को मोबाइल नहीं, अपनी संस्कृति से जोड़ना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यही वजह है कि हर वर्ष भादो एकादशी पर कर्मा पर्व पूरे हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे सांस्कृतिक पहचान

आदिवासी उत्थान कल्याण समिति के सचिव धनेश्वर बताते हैं कि लगभग 30 वर्ष पहले सरकारी सेवा के दौरान बरेली आए अमोन लकड़ा ने इस परंपरा की नींव रखी थी।

शहनाइ बरातघर में आदिवासी उत्थान कल्याण समिति की ओर से आयोजित कर्मा पूजा में नृत्य करतीं महिलाएं। जागरण

उनका उद्देश्य था कि परदेस में रह रहे आदिवासी परिवार अपनी सांस्कृतिक पहचान न भूलें और नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। आज वही छोटा प्रयास एक मजबूत सामाजिक परंपरा बन चुका है।

जब वन देवी ने कर्मा वृक्ष का रूप किया धारण

धनेश्वर ने कर्मा पर्व से जुड़ी लोकमान्यता भी साझा की, मुगलकाल में औरंगजेब के आक्रमण के दौरान उरांव समुदाय के राजा उरगन ठाकुर अपनी प्रजा के साथ सोन नदी के किनारे एक गुफा में शरण लिए हुए थे।

शहनाइ बरातघर में आदिवासी उत्थान कल्याण समिति की ओर से आयोजित कर्मा पूजा में वाद्य यंत्रों के संग नृत्य करते संस्था के लोग। जागरण

गुफा चारों ओर कर्मा वृक्षों से ढकी थी, जिससे शत्रु उसे देख नहीं सके। समुदाय की मान्यता है कि वन देवी ने कर्मा वृक्ष का रूप धारण कर उनकी रक्षा की थी। तभी से कर्मा डाल की पूजा अच्छी खेती, हरियाली और खुशहाली का प्रतीक मानी जाती है।

शहनाइ बरातघर में आदिवासी उत्थान कल्याण समिति की ओर से आयोजित कर्मा पूजा में वाद्य यंत्रों के साथ नृत्य करते संस्था के लोग। जागरण

परदेस में बसने के बावजूद परिवार अपनी जड़ों से बंधा हुआ है। परंपराएं भी पीढ़ी दर पीढ़ी महक रही हैं। आयोजन में प्रबंधक बेलस खल्खो, बलराम उरांव, अंकुर, भद्र गुप्त, लालन उरांव, अर्जुन भगत, बिलचन एक्का, संदीप, रविंद्र, बुद्धेश्वर भगत आदि उपस्थित रहे।

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