बरेली, जेएनएन : देश में पोल्ट्री ने इंडस्ट्री का रूप ले लिया है। हालांकि, अन्य विकासशील देशों की तुलना में अभी हमारे यहां डिमांड और सप्लाई महज एक तिहाई है। भारतीय परिवेश में अंडे और चिकन की बिक्री ही किसान की आय बढ़ाने के लिए काफी नहीं। जरूरी है कि अंडे और मीट से पौष्टिक उत्पाद बनाए जाएं।

इस दिशा में केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान (सीएआरआइ) ने पिछले कुछ सालों में काम किया है। जिसके सकारात्मक परिणाम आने शुरू हुए हैं। तमिलनाडु वेटनरी व एनिमल साइंस यूनिवर्सिटी, चेन्नई के पूर्व उप कुलपति डॉ. पी थंगाराजू ने कुक्कुट पालन को लेकर यह विचार रखे। डॉ. थंगाराजू केंद्र की अनुसंधान सलाहाकार समिति के अध्यक्ष हैं। वह समिति सदस्यों के साथ सीएआरआइ में वार्षिक बैठक में आए थे।

क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग हो खासियत

उन्होंने कहा कि देश के वातावरण में काफी विविधता है। इसी के हिसाब से इंसान के शरीर को विटामिन व अन्य पौष्टिक तत्वों की जरूरत होती है। चेन्नई और जम्मू-कश्मीर में एक ही तरह के चिकन और अंडे समान रूप से पौष्टिक साबित नहीं हो सकते। ऐसे में शोध के जरिए कुक्कुट पालन और उनके खान-पान के तरीकों में बदलाव कर अंडों को क्षेत्रवार उपयोगी बनाना होगा।

ग्रामीण इलाकों तक पहुंचे शोध का फायदा

उन्होंने मौजूद वैज्ञानिकों से कहा कि शोध के जरिए जरूरी बदलाव कर कुक्कुट उत्पादों को बेहतर बनाया जाता है, लेकिन जरूरी है कि शोध का प्रचार-प्रसार भी हो। जिससे ग्रामीण इलाकों के किसानों और कुक्कुट पालकों तक इसका फायदा पहुंच सके। तभी हम विकसित देशों की कतार में शामिल हो सकेंगे।

पुराने शोधों का परिणाम जाना, नए पर सलाह

अनुसंधान सलाहकार समिति अध्यक्ष के अलावा अन्य सदस्य पूर्व सहायक महानिदेशक आइसीएआर डॉ. लाल कृष्णा, पूर्व निदेशक सेंटर फॉर एडवांस स्टडीज डॉ.वीपी वाष्र्णेय, कृषि मंत्री के प्रतिनिधि भानु प्रताप सिंह चौहान मौजूद थे। समिति ने पूर्व में हो चुके शोधों के बारे में जाना। वहीं, नए शोधों को लेकर सलाह दी। सीएआरआइ निदेशक डॉ. एबी मंडल, प्रधान वैज्ञानिक डॉ. संजीव कुमार और डॉ. संदीप सरन आदि मौजूद थे।  

Posted By: Abhishek Pandey

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप