शशांक अग्रवाल, बरेली :  मार्च नजदीक आते ही हर विभाग अपने टारगेट पूरे करने में लगा है। शहर में टैक्स वसूली अभियान चला रही नगर निगम टीम के तेवर ही कुछ अलग है। दो दिन पहले टीम दल-बल के साथ बरेली कॉलेज पहुंची और पुराने खाते खोलकर 14.32 करोड़ रुपये से ज्यादा का बकाया बिल बनाकर प्राचार्य को थमा दिया। इतनी बड़ी राशि देखकर प्राचार्य अनुराग मोहन का मानो दिल बैठने लगा। उसी दौरान एक विभाग से कार्यक्रम में शामिल होने के लिए फोन आ गया। प्राचार्य के मुंह से बरबस ही निकल गया- मैडम, कार्यक्रम छोड़िए। इतना बड़ा बिल आ गया है कि मेरा तो कलेजा बैठा जा रहा। फोन डिस्कनेक्ट कर टीम से बोले- कॉलेज के पास बजट नहीं है, मुश्किल से खर्च चल रहा है। आप ही कॉलेज संभालें, हम जा रहे हैं। इतना सुनते ही टीम ने प्राचार्य को कर अदायगी का रास्ता सुझाकर रस्म अदायगी की और चली गई।

कुछ तो बोलिए 

विश्वविद्यालय की परीक्षाओं की तैयारियों के लिए बरेली कॉलेज में मीटिंग बुलाई गई थी। प्रोफेसर अपनी जगह आकर बैठ गए। सामान्य निर्देश के बाद सामने से सुझाव मांगे गए। मौका मिला तो एक प्रोफेसर ने परीक्षा व्यवस्था की कलई उधेड़ना शुरू कर दी। उनके बाद दूसरे, तीसरे व चौथे प्रोफेसर भी खड़े हो गए। तेवर दिखा दिए। बाहर से आने वाले परीक्षकों पर भी सवाल खड़े कर दिए। उनका रवैया एक मैडम को समझ नहीं आया। वह भी कुर्सी से उठीं, पूछने लगीं- व्यवस्थाएं तो बाद की बात है, पहले यह देखिए कि व्यवहार कैसा किया जाता है। प्राचार्य भी समर्थन में आ गए। प्रोफेसरों को शिष्टाचार का पाठ पढ़ा दिया। कहा कि बाहर से आने वाले भी शिक्षक ही हैं, उन्हें भी आदर देना होगा। मामला उल्टा पड़ गया तो प्रोफेसरों ने मुद्दा उठाने वाले पहले प्रोफेसर की ओर देखा। वो चुप दिखे तो आवाज लगी-कुछ तो बोलिए।

गुरुजी सबसे बड़े खिलाड़ी 

यूं तो सरकार ने बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए खेलो बच्चों, बढो बच्चों का नारा दिया है। जिससे बच्चे उपलब्धियां हासिल करें और कॉलेज का नाम भी रोशन हो। विश्वविद्यालय में इसके उलट नजारा है। स्थापना दिवस पर खेल प्रतियोगिताएं कराई गईं। छात्रों को लगा कि उन्हें हाथ दिखाने का मौका मिलेगा मगर ऐसा नहीं हुआ। उनके बजाय गुरुजी मैदान में उतर पड़े। कर्मचारियों को भी बुला लिया। छात्रों ने पूछा तो उनसे कह दिया कि तुम्हारा नंबर अभी नहीं आएगा। दो दिन इंतजार के बाद छात्रों का सब्र जवाब दे गया तो मैदान से बाहर निकलते खेल वाले गुरुजी को घेर लिया। कहने लगे, सालभर आप खेल करते हैं, स्थापना दिवस पर मैदान में हमें खेल लेने दीजिए। मगर, वो भला कहां सुनने वाले। ठीक है-ठीक कहकर आगे बढ़ते चले गए। वास्तव में, गुरुजी हैं तो खिलाड़ी। बात-बात पर हल्ला करने वाले छात्र भी गुहार लगाकर रह गए।

मैडम, मैं एसीएम हूं

बरेली कॉलेज में पिछले दिनों रोवर रेंजर्स शिविर लगा। सारे इंतजाम पूरे करने का मैडम ने बीड़ा उठाया। सबसे पहले खाने का अंदाजा लगाया, बच्चों के ठहरने की व्यवस्था की, मुख्य अतिथि व मंच पर कौन लोग होंगे, यह सब तय किया। जिस रफ्तार से तैयारियां हो रही थीं, प्राचार्य अनुराग मोहन को कुछ अंदेशा हुआ तो टोक दिया कि मैडम, मुख्य अतिथि को आमंत्रण भेज दिया कि नहीं। मैडम ने हामी भरते हुए कहा, चिंता न करें। खैर, तय तारीख पर कार्यक्रम शुरू हुआ। मुख्य अतिथि को देखकर सब चौंक पड़े। आमंत्रण एडीएम को भेजने की बात हुई थी, आए एसीएम। मैडम फिर भी बेपरवाह थीं। संचालन करते हुए मुख्य अतिथि को संबोधन के लिए बुलाया- एडीएम साहब आएं। वो मंच पर पहुंचे। माइक पकड़ते ही बोले- मैडम, मैं एसीएम हूं। इस पर लोग हंस पड़े। दरअसल, मैडम जानती ही नहीं थी कि किसे आमंत्रित कर आईं। 

Posted By: Ravi Mishra

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