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वायुसेना दिवस: आपरेशन सिंदूर हो या केदारनाथ त्रासदी, जब-जब देश पर संकट आया, इस एयरबेस ने ऐसे बचाई हजारों जानें

Published: Thu, 08 Oct 2026 03:16 PM (IST)

बरेली का त्रिशूल एयरबेस देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और शहर के विकास से भी जुड़ा है। ...और पढ़ें

उत्तराखंड में अगस्त-2025 में जलप्रलय के बाद राहत एवं बचाव सामग्री लेकर जाता वायुसेना का बोइंग सी-17 ग्लोबमास्टर। फाइल फोटो-स्रोत वायुसेना

उत्तराखंड में अगस्त-2025 में जलप्रलय के बाद राहत एवं बचाव सामग्री लेकर जाता वायुसेना का बोइंग सी-17 ग्लोबमास्टर। फाइल फोटो-स्रोत वायुसेना

HighLights

  1. वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए की गई थी एयरफोर्स स्टेशन की स्थापना

नीलेश प्रताप सिंह, बरेली। आसमान में उड़ता लड़ाकू विमान… कुछ ही क्षण में बादलों को चीरती उसकी रफ्तार… भारतीय वायुसेना की गर्जना हर किसी का सीना गर्व से चौड़ा कर देती है। आपरेशन सिंदूर हो या केदारनाथ में जलप्रलय। हर संकट के समय भारतीय वायुसेना अपने शौर्य, साहस और शक्ति से देवदूत का किरदार निभाने में अग्रणी भूमिका निभा रही।

नाथनगरी बरेली में त्रिशूल एयरबेस भी हर किसी को गर्व से भर देता है। हवाई सुरक्षा की तेजी से बदलती चुनौतियों के बीच त्रिशूल एयरबेस अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखी है।

भारतीय वायुसेना का पहला सुपरसोनिक लड़ाकू विमान मिग-21 के साथ स्क्वाड्रन लीडर अंकुर नाईक (रि.)। सौ. स्वयं

वायुसेना दिवस पर समूचा राष्ट्र वायुवीरों और भारतीय वायुसेना के शौर्य, साहस और बलिदान को नमन कर रहा है। त्रिशूल एयरबेस को याद करना इसलिए भी अहम है, क्योंकि इसकी कहानी केवल विमानों की नहीं, बल्कि उन वायु योद्धाओं की है जो हर परिस्थिति में देश की सुरक्षा के लिए तैयार रहते हैं।

आसमान में जब त्रिशूल की गर्जना सुनाई देती है, तो शहर को सिर्फ विमान नहीं देश की ताकत, सुरक्षा और भविष्य की उड़ान भी नजर आती है। प्रस्तुत है मुख्य अंश...

त्रिशूल से जुड़ा बरेली का विकास

त्रिशूल एयरबेस केवल सामरिक महत्व के कारण ही शहर की पहचान नहीं है। इसके परिसर में विकसित सिविल एन्क्लेव ने शहर के नागरिक विमानन को भी नई दिशा दी है। उड़ान योजना के तहत बरेली एयरपोर्ट का सिविल एन्क्लेव त्रिशूल एयरबेस में विकसित किया गया है।

वर्ष-2019 में सिविल एन्क्लेव का उद्घाटन हुआ और 2021 में यहां से नियमित वाणिज्यिक उड़ानों की शुरुआत हुई। हवाई सेवाओं के विस्तार से बरेली का देश के दूसरे प्रमुख शहरों से संपर्क मजबूत हुआ है।

इससे कारोबार, पर्यटन, शिक्षा और रोजगार के नए अवसरों को भी बल मिला है। इस तरह त्रिशूल एक ओर देश की सुरक्षा का मजबूत प्रहरी है, तो दूसरी ओर बरेली के विकास की उड़ान से भी जुड़ा हुआ है।

छह दशक से देश की सीमा का प्रहरी

वर्ष-1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद देश की सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बरेली में एयरफोर्स स्टेशन की स्थापना की गई। इसके बाद बदलते समय के साथ वायुसेना की तकनीक और क्षमताएं बढ़ीं और त्रिशूल की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती गई। छह दशक से अधिक समय से त्रिशूल एयरबेस बरेली की धरती से देश की हवाई सुरक्षा व्यवस्था को मजबूती देता आ रहा है।

2022 में आसमान में दिखी वायुशक्ति

त्रिशूल एयरबेस पर वर्ष 2022 में आयोजित एयर शो ने बरेलीवासियों की स्मृतियों में खास जगह बनाई। भारतीय वायुसेना की 90वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित ‘अपने बलों को जानें’ कार्यक्रम में सुखोई-30 एमकेआई और सूर्यकिरण टीम ने हवाई करतब दिखाए।

आकाश गंगा पैराट्रूपर्स ने भी प्रदर्शन किया। सूर्यकिरण की नौ विमानों की टीम के प्रदर्शन और सुखोई की तेज उड़ान ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया। कार्यक्रम का उद्देश्य नागरिकों और विशेष रूप से विद्यार्थियों को वायुसेना की क्षमता, अनुशासन और कार्यप्रणाली से परिचित कराना भी था।

केदारनाथ जलप्रलय में निभाई अहम भूमिका

वर्ष 2013 में उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन के बाद वायुसेना ने बड़े पैमाने पर राहत एवं बचाव अभियान चलाया था। इसे आपरेशन राहत नाम दिया गया।

इस अभियान में बरेली से संचालित एक एएलएच हेलीकाप्टर ने विन्च की मदद से पहाड़ी क्षेत्र में फंसे करीब 50 ग्रामीणों को बचाया था। इसके बाद उसे पिथौरागढ़ क्षेत्र में राहत और खाद्य सामग्री पहुंचाने के लिए भी तैनात किया गया।

इसी तरह, अगस्त 2025 में उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली-हर्षिल क्षेत्र में बादल फटने के बाद अचानक बाढ़ और भूस्खलन की स्थिति पैदा हुई। भारतीय वायुसेना ने बरेली में तैनात एमआई-17 और एएलएच एमके-III हेलीकाप्टरों को हाई अलर्ट पर रखते हुए वृहद स्तर पर अभियान चलाया।

मिग-21 की गर्जना भी सुन चुका है त्रिशूल

त्रिशूल की सैन्य विरासत में मिग-21 का दौर भी खास महत्व रखता है। त्रिशूल एयरबेस में सेवा दे चुके स्कवाड्रन लीडर अंकुर नाईक (रि.) बताते हैं कि, वर्ष- 1973 में मिग-21 एफएल विमानों से जुड़ी एक आपरेशनल कन्वर्जन यूनिट बरेली आई और 1978 तक यहां रही।

मिग-21 भारतीय वायुसेना के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले प्रमुख लड़ाकू विमानों में रहा। लड़ाकू पायलटों के प्रशिक्षण में कम ऊंचाई पर उड़ान, पहाड़ी क्षेत्रों में संचालन और विभिन्न परिचालन परिस्थितियों में विमान को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने की दक्षता रही।

इसी तरह, त्रिशूल एयरबेस की विरासत में मिग-25 का अध्याय भी जुड़ा है। कारगिल युद्ध के दौरान मिग-25 को उसकी ऊंचाई और कैमरा क्षमता के कारण रणनीतिक टोही के लिए इस्तेमाल करने की योजना बनाई गई।

अंकुर नाईक के अनुसार, एक मई-2006 को बरेली से अंतिम औपचारिक उड़ान के बाद भारतीय वायुसेना से मिग-25 को विदा कर दिया गया।

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