शिक्षक बनना चाहती थीं सुष्मिता, एक प्रेरणा ने बदला रास्ता; अब तक 350 से अधिक बेघर-मानसिक पीड़ितों को मिलाया अपनों से
सुष्मिता शर्मा बरेली में मानसिक रूप से बीमार और बेघर लोगों की मदद करती हैं, उन्हें उपचार दिलाकर स्वजनों से ...और पढ़ें

सुष्मिता शर्मा। सौ. स्वयं
HighLights
मानसिक बीमार लोग को सुष्मिता दिलातीं उपचार, स्वजन का पता लगाकर पहुंचाती घर
मनीस पांडेय, बरेली। न सिर पर छत, न खाने का ठिकाना। तन पर मैले-कुचैले कपड़े और आंखों में अपनों से बिछड़ने का दर्द। कोई अपना नाम-पता बताने की स्थिति में नहीं तो कोई मानसिक बीमारी के कारण घर से निकलकर सैकड़ों किलोमीटर दूर पहुंच गया। सड़कों पर भटकते ऐसे लोगों को देखकर अधिकांश राहगीर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन सुष्मिता शर्मा के कदम ठहर जाते हैं।
वह उन्हें केवल भोजन और आश्रय ही नहीं दिलातीं, बल्कि उपचार कराकर अपनों तक पहुंचाने की कोशिश भी करती हैं। किसी को वर्षों बाद घर की राह मिलती है तो किसी को सुरक्षित ठिकाना।
दूसरों की पीड़ा को अपनी जिम्मेदारी बनाने वाली सुष्मिता अब तक 350 से अधिक जरूरतमंदों की मदद कर चुकी हैं। मूल रूप से रजऊ परसपुर की रहने वाली सुष्मिता वर्तमान में पशुपति विहार में रहती हैं।
उन्होंने बरेली कालेज से बीएससी और रसायन विज्ञान में एमएससी की पढ़ाई की है। वर्तमान में बीएड कर रहीं हैं। कभी उनका सपना शिक्षक बनने का था, लेकिन मनोविज्ञान के क्षेत्र में काम कर रहे बड़े भाई से प्रेरणा मिली तो जिंदगी का उद्देश्य बदल गया।
सड़क किनारे भटकती महिलाओं की स्थिति ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने भाई के सहयोग से मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों की मदद शुरू कर दी।
सुष्मिता बताती हैं कि मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण कई लोग घर से निकल जाते हैं। रास्ता भटकते हुए दूसरे शहरों तक पहुंच जाते हैं। वहां न कोई पहचानने वाला होता है और न देखभाल करने वाला।
कई बार उन्हें उपेक्षा और दुर्व्यवहार भी सहना पड़ता है। ऐसे लोगों की जानकारी मिलते ही वह अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचती हैं। उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाकर उपचार की व्यवस्था करती हैं।
इसके बाद स्वजन का पता लगाने की कोशिश शुरू होती है। उनकी इस मुहिम में पुलिस और जिला प्रशासन भी सहयोग कर रहा है। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की ओर से थानों को सहयोग के लिए पत्र जारी किया गया है।
पुलिसकर्मी और स्थानीय लोग भी सड़क पर भटकते लोगों की जानकारी देते हैं। अब तक सहायता पाने वालों में नेपाल, कोलकाता, बिहार और पूर्वांचल के लोग भी शामिल हैं।
सात माह की गर्भवती भटककर पहुंची बरेली, पति से मिलाया
सुष्मिता के प्रयासों से कई बिछड़े लोग अपने परिवार तक पहुंच सके हैं। ऐसा ही एक मामला बिथरी चैनपुर क्षेत्र में सामने आया। यहां करीब 30 वर्षीय महिला भटकती मिली। वह सात माह की गर्भवती थी और कानपुर से रास्ता भटककर बरेली पहुंच गई थी।
ग्रामीणों ने इसकी जानकारी दी तो सुष्मिता ने महिला को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। मानसिक चिकित्सालय में उसका उपचार कराया गया। इसके बाद उसके परिवार का पता लगाया गया।
जानकारी मिलने पर कानपुर में रहने वाला उसका पति बरेली पहुंचा और पत्नी को अपने साथ घर ले गया। इसी तरह बीसलपुर की करीब 60 वर्षीय महिला भी घर से भटककर बरेली पहुंच गई थी। सुष्मिता ने उसे भी स्वजन तक पहुंचाने में सहायता की।
न सरकारी फंड, न संसाधनों की भरमार, फिर भी जारी सेवा
सुष्मिता की इस मुहिम के लिए कोई सरकारी फंड नहीं मिलता। समाजसेवियों और स्थानीय लोगों के सहयोग से जरूरतमंदों के भोजन, रहने और उपचार का खर्च जुटाया जाता है। चुनौतियां भी कम नहीं हैं।
कई बार गंदे कपड़ों में होने के कारण ई-रिक्शा और आटो चालक जरूरतमंदों को बैठाने से मना कर देते हैं। ऐसे में एंबुलेंस, कार या दूसरे साधनों की व्यवस्था करनी पड़ती है। इसके बावजूद सुष्मिता और उनकी टीम मदद के प्रयास जारी रखती है।
उनके साथ करीब 10 लोगों की टीम काम करती है। इसमें पारुल जायसवाल, गीता राठौर, नन्ही, आदित्य प्रजापति, संजय प्रताप सिंह, प्रतीक शर्मा, सनी गहलोत, रणजीत मौर्य, प्रेम कुमार, हरदयाल और अजमत सलमानी प्रमुख रूप से सहयोग कर रहे हैं। सभी मिलकर ऐसे लोगों को सुरक्षित स्थान और उपचार दिलाने के साथ उनके परिवारों तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
