बिना जांच नगालैंड से फिटनेस सर्टिफिकेट! बरेली में यात्रियों की जान से खेल रहे निजी बस संचालक
बरेली में निजी बस संचालक यात्रियों की जान जोखिम में डाल रहे हैं, क्योंकि वे बिना उचित जांच के नगालैंड ...और पढ़ें

सेटेलाइट पर पंजाब, दिल्ली और अन्य शहर को जाने के लिए खड़ी प्राइवेट बसें। जागरण
HighLights
रोडवेज बस के समानान्तरण चलाई जा रही राजस्थान, पंजाब, दिल्ली के लिए बसें
शार्ट सर्किट से होते हैं सर्वाधिक हादसे, वायरिंग की जांच का नहीं है कोई मानक
अनिल कुमार, बरेली। 23 सितंबर को ग्रेटर नोएडा में चलती निजी बस में आग से नौ यात्रियों की मौत हुई थी, उसके बाद कोई सुधार हुआ...? जवाब यह है कि कुछ भी नहीं बदला। ग्रेटर नोएडा की तरह अपने शहर से भी दर्जनों निजी बसें जयपुर, दिल्ली, पंजाब के लिए हर रात में सैकड़ों यात्री लेकर रवाना होती हैं। इन बसों की फिटनेस सही है या नहीं, इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं।
इनकी सजावटी लाइटों के तारों में शार्ट सर्किट रोकने का कोई इंतजाम है या नहीं, यह किसी को पता नहीं। यात्री खतरे में हैं और बसों के संचालक सबसे बड़े खिलाड़ी बन बैठे...नियमों को रौंदकर, मानकों को कुचलकर।
बरेली से जयपुर जाने वाली रोडवेज बस का किराया 600 रुपये है, जिसमें यात्री का बीमा भी शामिल होता है। इस सरकारी व्यवस्था के समानान्तर सेटेलाइट बस अड्डे के पास और श्यामगंज में कई निजी बस संचालन केंद्र हैं।

रविवार को श्यामगंज में ऐसे ही एक कार्यालय पहुंचकर जयपुर वाली एसी का किराया पूछा तो कर्मचारी ने एक हजार रुपये बताया। यात्री सुरक्षा पर सवाल करने पर बोला- इससे हमें क्या मतलब।
उसके बराबर में एक अन्य ट्रैवल्स एजेंसी संचालक के पास पहुंचे तो उसने नान एसी बस का किराया 600 रुपये बताया। उससे पूछा कि रोडवेज से सस्ता किराया क्यों ? इसका जवाब देने के बजाय वह सकपका गया।
उससे यात्री बीमा के बारे में पूछने पर जवाब दिया कि बस का बीमा तो है ही...। इसके बाद परिवहन निगम के सेटेलाइट बस अड्डा पहुंचे, वहां से 100 मीटर की दूरी पर ट्रैवल्स एजेंसियों की मंडी लगी रहती है।

छोटी सी दुकान, उसके सामने सड़क पर लगे बोर्ड- जयपुर, दिल्ली, पंजाब के लिए सीधी बस सेवा। इन्हीं में एक कार्यालय के कर्मचारी से पंजाब जाने वाली बस का किराया पूछा तो 650 रुपये बताया।
यात्री सुरक्षा के इंतजाम जानने चाहे तो बोला- पीछे इमरजेंसी गेट खुला तो है। इस एजेंसी से 40 बसें संचालित होती हैं, जिनका मालिक मेरठ में रहता है। सभी ट्रैवल्स एजेंसियों की बसें रात में ही रवाना होती हैं, ताकि रास्ते में टोकाटाकी न हो।
नियमों के झोल का ऐसे उठाते हैं फायदा
उप्र में फिटनेस प्रमाणपत्र लेने के लिए बस को क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय ले जाना जरूरी है। वहां विशेषज्ञ बस की स्थिति जांचने के बाद प्रमाणपत्र देते हैं। मोडिफाई कराई गई निजी बसें परीक्षण में फेल न हों, इसके लिए संचालकों ने पैंतरेबाजी की।
आल इंडिया का आनलाइन परमिट लेकर पूरे देश में बसें संचालित करने की अनुमति ले ली जाती है। इसमें भी कमजोर नियम वाले बिहार, झारखंड आदि राज्यों का सहारा लिया जाता है। इसके बाद फिटनेस की बारी आने पर नगालैंड से आनलाइन प्रमाणपत्र प्राप्त कर लेते हैं, जिसमें बस के परीक्षण की जरूरत नहीं पड़ती।
वायरिंग की जांच नहीं, दो किलो के सिलिंडर के भरोसे 55 से 60 यात्री
आल इंडिया परमिट लेकर दूसरे प्रदेशों तक दौड़ने वाली बसों में अधिकतर हादसे शार्ट सर्किट के कारण होते हैं। इनमें अधिकतर बसों को सजावटी बनाने के लिए रंगीन लाइटें आदि लगवाई जाती हैं।
वायरिंग ठीक है या नहीं, इसकी जांच किसी स्तर पर नहीं होती। चेकिंग के दौरान भी परमिट व फिटनेस प्रमाणपत्र ही देखा जाता है। बसों में अग्निसुरक्षा के नाम पर सिर्फ दो किलो का अग्निशमन सिलिंडर होता है, जिससे ऊंची लपटें बुझा पाना संभव नहीं।
जबकि प्रत्येक बस में 55 से 60 या इससे अधिक यात्री तक होते हैं। मोडिफाई बसों में सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए इमरजेंसी गेट भी बंद कर दिया जाता है।
ऐसे दौड़ रही बसें
- आल इंडिया परमिट वाली बसें समूहों या अलग-अलग यात्रियों को ले जा सकती हैं। इसके बदले उन्हें सालाना तीन लाख या तिमाही 90 हजार रुपये शुल्क आनलाइन देना होता हे।
- इंटरस्टेट परमिट की बसें भी एक-एक कर यात्री ले जा सकती हैं, मगर सूची रखनी अनिवार्य है।
- कांट्रेक्ट कैरिज परमिट वाली बसें सिर्फ बुकिंग पार्टी, स्कूल, फैक्ट्री, बरात आदि में संचालित हो सकती हैं।
- स्टेट कैरिज परमिट वाली बसें निर्धारित रूट पर सवारियां ले जा सकती हैं।
- रोडवेज फ्लीट परमिट वाली बसें अनुबंध समाप्त होने पर सामान्य कैरिज की श्रेणी में आ जाती हैं।
बसों की नियमित चेकिंग की जाती है, जिसमें कमियां मिलने पर जुर्माना लगाया जाता है। बसों में विद्युत सुरक्षा के मानक तय नहीं हैं। इस संबंध में 30 सितंबर को लखनऊ में बैठक में रूपरेखा बन सकती है।
- प्रणव झा, आरटीओ
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