विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

'तारीख पे तारीख' में बीती जवानी: 1997 में पुलिस ने लगाया झूठा आरोप; 29 साल बाद बेगुनाह साबित हुए दो दोस्त, टूटा सेना में जाने का सपना

Published: Fri, 16 Oct 2026 02:22 AM (IST)

बरेली में दो दोस्तों विक्रम और गोपाल को 29 साल पहले ठगी के झूठे आरोप में फंसाया गया था, जिससे ...और पढ़ें

विक्रम सिंह और गोपाल

विक्रम सिंह और गोपाल

HighLights

  1. बरेली में 29 वर्ष पहले ठगी के आरोप में पकड़े गए थे विक्रम और गोपाल

नाहर खान, बरेली। तारीख पे तारीख...। विक्रम और गोपाल की जिंदगी के 29 वर्ष इसी में गुजर गए। उन पर जवानी में ठगी का दाग लगा, जिसके धुलते-धुलते बुढ़ापे की चौखट आ गई। वे तारीखों पर कोर्ट पहुंचते, मगर उन्हें जेल भेजने वाले पुलिसकर्मी कभी पलटकर नहीं आए। गुरुवार को सिविल जज (सीनियर डिवीजन) त्वरित न्यायालय की न्यायाधीश अंकिता चौधरी ने दोषमुक्त किया तो दोनों ने ठंडी सांस ली...अब तारीखों पर नहीं आना पड़ेगा।

बात दो जुलाई 1997 की है। बरेली कालेज में बीए प्रथम वर्ष की पढ़ाई करने वाले नकटिया निवासी विक्रम सिंह अपने दोस्त गोपालकृष्ण के साथ स्कूटर से मनोरंजन सदन की ओर गए थे। उस समय पुलिस चेकिंग कर रही थी।

उन्होंने स्कूटर रोका, पुलिस ने तलाशी ली। इसके बाद पुलिसकर्मी उन्हें कोतवाली ले गए। कहा कि ये दोनों लड़के 50-50 रुपये नोटों के बीच सफेद कागज के टुकड़े लगाकर ठगी करते पाए गए। उन पर मुकदमा दर्ज हुआ।

कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिए गए। बाद में पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की, उसमें भी लिखा कि दोनों आरोपित राहगीरों से ठगी करते थे। कुछ समय बाद उन्हें जमानत मिल गई, मगर समाज शक की निगाह से देखने लगा था।

कोर्ट में केस चला, सुनवाई पर दोनों दोस्त साथ जाने लगे। उनके अधिवक्ता राहुल उपाध्याय ने बताया कि कोर्ट में पुलिसकर्मी पैरवी करने नहीं आए। कई मौके दिए गए, लेकिन समुचित गवाही हुई ना ही साक्ष्य प्रस्तुत किए गए।

कुछ समय पहले यह केस त्वरित न्यायालय में आया, ताकि सुनवाई जल्द पूरी हो सके। गुरुवार को न्यायाधीश ने दोनों को दोषमुक्त कर दिया। अब 53 वर्ष के हो चुके विक्रम सिंह और 55 वर्ष के हो चुके गोपालकृष्ण शर्मा को जिंदगी के 29 वर्ष इस तरह बीतने का मलाल है।

गुरुवार को चेहरे पर संतोष के भाव लेकर कोर्ट परिसर से बाहर निकले। वे बोले, हम दोनों दोस्त सेना में जाने का सपना देखते थे। सुबह दौड़ लगाते थे, सेहत बनाते थे। उस मुकदमे ने सपना चकनाचूर कर दिया। परिवार वालों को क्या बताते, क्योंकि बेगुनाही का कोई प्रमाण नहीं था।

मैं कैसे साबित कर पाता कि बीए में पढ़ने वाले लड़के घूमने निकले थे, ठगी करने नहीं...। आखिरकार न्याय मिला। जीवन यापन के लिए विक्रम सिंह वाहन चालक बन गए। गोपालकृष्ण एक फर्म में नौकरी करने लगे। उनका परिवार है, जो अब कह सकेगा कि ठगी का दाग झूठा था...।

यह भी पढ़ें- बरेली के नए SP सिटी बने IPS चिराग जैन: आजमगढ़ में 6000 चोरी के मोबाइल ढूंढकर जीता था DGP मेडल, जानें इनकी प्राथमिकताएं