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10 साल के ध्रुव ने बंगाली गीत 'जागो तुमि जागो' से बांधा समां, पंडाल में गूंजी तालियां; भक्ति में मिटी भाषा की सीमा

Published: Wed, 21 Oct 2026 01:45 PM (IST)

बरेली के दुर्गा पंडाल में 10 वर्षीय ध्रुव तिवारी ने बंगाली गीत 'जागो तुमि जागो' गाकर समां बांधा, जिससे भक्ति ...और पढ़ें

दुर्गा पंडाल में गीत गाते हुए ध्रुव।सौ. आयोजक

दुर्गा पंडाल में गीत गाते हुए ध्रुव।सौ. आयोजक

HighLights

  1. हिंदी भाषी बच्चे भी पंडाल में बंगाली गीतों से बांध रहे समां

  2. दुर्गा पंडालों में दिख रही सांस्कृतिक एकता की खूबसूरत तस्वीर

हिमांशु अग्निहोत्री, बरेली। बनारस के मूल निवासी संतोष तिवारी के 10 वर्षीय बेटे ध्रुव तिवारी की आवाज में जब बंगाली गीत ‘जागो तुमि जागो, जागो दुर्गा...’ गूंजता है तो रेलवे जंक्शन के पास स्थित रेलवे मनोरंजन सदन का दुर्गा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता है।

ध्रुव की जुबां पर बंगाली गीत और मन में मां दुर्गा के प्रति अटूट श्रद्धा। उसकी प्रस्तुति इस बात की गवाही देती है कि भक्ति की कोई भाषा नहीं होती। मां के प्रति आस्था लोगों को भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से परे एक सूत्र में पिरो देती है। ध्रुव छह माह से बांग्ला सीख रहे हैं।

शहर के अलग-अलग दुर्गा पंडालों में बंगाली समाज की ओर से दुर्गोत्सव मनाया जा रहा है। इन आयोजनों में बंगाली संस्कृति की छटा के साथ साझी परंपरा की खूबसूरत तस्वीर भी उभर रही है।

खास बात यह है कि बंगाली समाज के इस महोत्सव में हिंदी भाषी लोग भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ भागीदारी कर रहे हैं। वे न सिर्फ बंगाली गीतों को आत्मसात कर रहे हैं, बल्कि पारंपरिक आयोजनों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।

बंगाली गीतों में घुल रहे हिंदी भाषी बच्चों के सुर

डाॅ. शुभा चटर्जी से संगीत का प्रशिक्षण ले रहीं काशिका, वैशाली, लक्ष्मी और ज्योति भी बंगाली गीतों के माध्यम से मां दुर्गा की महिमा का गुणगान करती हैं। उनकी प्रस्तुतियां दर्शकों को भावविभोर कर देती हैं।

ध्रुव की तरह इन बच्चों ने भी संगीत के जरिए भाषा की दीवारों को पीछे छोड़ दिया है। उनके सुरों में बंगाली संस्कृति के प्रति लगाव और मां के प्रति समर्पण साफ झलकता है।

धुनुची नृत्य में भी दिखती है साझी संस्कृति

मनोरंजन सदन के मीडिया प्रभारी ध्रुव चटर्जी बताते हैं कि दुर्गा पंडालों में होने वाला पारंपरिक धुनुची नृत्य भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इसमें स्थानीय महिलाएं बढ़-चढ़कर प्रतिभाग कर रही हैं। बंगाली समाज की परंपराओं को करीब से जानने और उनमें शामिल होने का उत्साह उनके चेहरों पर नजर आता है।

दूर दराज से पहुंच रहे श्रद्धालु

दुर्गोत्सव में शामिल होने के लिए रामपुर, पीलीभीत, शाहजहांपुर और मुरादाबाद से भी श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। पूजा, संगीत और नृत्य के बीच यह महोत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मेलजोल का उत्सव भी बन गया है।

ध्रुव के बंगाली गीत से लेकर धुनुची नृत्य में स्थानीय महिलाओं की भागीदारी तक, हर दृश्य यही संदेश दे रहा है कि भाषाएं भले अलग हों, लेकिन मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा और परंपराओं का सम्मान सबको एक सूत्र में बांधता है।

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