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बाराबंकी: जिले की केंद्रीय राजनीति अब तक युवा नेताओं के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। एक-दो चुनाव को अपवाद मान लिया जाए तो अब तक ज्यादातर चुनावों में मतदाताओं ने युवा नेताओं के सिर ही जीत का सेहरा सजाया है। इतना ही नहीं उनके कामकाज को देखकर किसी को हैट्रिक लगाने तो किसी को एक से अधिक बार संसद में अपनी पैरोकारी करने के लिए बतौर रहनुमा चुना है। हालांकि, जांचे-परखे या अनुभवी नेताओं पर भी कई मौकों पर भरोसा किया गया है।पहली लोकसभा में अनुभव को तरजीह देते हुए मतदाताओं ने 55 वर्षीय मोहनलाल सक्सेना पर भरोसा जताया। वहीं 1957 में समाजवादी नेता 31 वर्षीय रामसेवक यादव को दलीय उम्मीदवारों पर तव्वजो देते बतौर निर्दलीय उम्मीदवार संसद भेजा। इतना ही नहीं 1962 और 1967 में भी विश्वास जताकर हैट्रिक लगाने का मौका दिया। 1984 में तीस साल की उम्र में कमला प्रसाद रावत को अपनी रहनुमाई सौंपा। अनुभव को देखते हुए वर्ष 2004 में दोबारा मौका दिया। इसी प्रकार राम सागर रावत पहली बार 34 साल में उम्र में 1989 में सांसद चुने गए। इसके बाद 1991 और 1996 में लगातार तीन बार नेतृत्व सौंपा। अनुभव को तरजीह देने के बात आई तो 1999 में एक बार फिर राम सागर पर ही मतदाताओं ने भरोसा जताया। बैजनाथ रावत को 1998 में 44 वर्ष की उम्र में जनता की रहनुमाई का मौका मिला। तब उनकी भी पहचान एक युवा नेता रूप में ही थी। हालांकि, लंबा प्रशासनिक अनुभव रखने वाले डॉ. पीएल पुनिया को भी मतदाताओं ने सिर-माथे बैठाने में कोई कोताही नहीं की। उन्हें 2009 के चुनाव में संसद में पहुंचाया।प्रियंका सबसे युवा, पुनिया बुजुर्ग सांसद बाराबंकी की संसदीय राजनीति में वर्तमान सांसद प्रियंका सिंह रावत और पूर्व सांसद डॉ. पीएल पुनिया दोनों ही अब तक की नजीर हैं। 29 वर्ष की अवस्था में 2014 में जिले का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रियंका सिंह रावत अब सबसे कम में उम्र में चुनावी बैतरणी पार करने वालों में हैं। वहीं 64 साल की उम्र में 2009 में सांसद चुने गए पुनिया का नाम बुजुर्ग नेता के जाना जाता है। मतदाताओं ने कब-किसके सिर बांधा ताजवर्ष प्रतिनिधि उम्र1951- मोहन लाल सक्सेना 55 1957-स्वामी रामानंद शास्त्री 50 1957-रामसेवक यादव 31 1972-रुद्र प्रताप सिंह 35 1977-राम किकर रावत 55 1984-कमला प्रसाद रावत 30 1989-राम सागर रावत 34 1998-बैजनाथ रावत 44 2009-पीएल पुनिया 64 2014- प्रियंका सिंह रावत 29

Posted By: Jagran

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