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दिल्ली की गणेश फार्मा से यूपी के किन जिलों तक पहुंचा कोडीनयुक्त सीरप? खातों से खुलेगा राज

Published: Wed, 16 Sep 2026 10:31 AM (IST)

नौ करोड़ रुपये के कोडीनयुक्त कफ सीरप प्रकरण में जांच दिल्ली की गणेश फार्मा से उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों तक सप्लाई चेन और बैंक खातों पर केंद्रित है।

कोडीनयुक्त सीरप।

कोडीनयुक्त सीरप।

HighLights

  1. नौ करोड़ के कोडीनयुक्त सीरप प्रकरण में जांच जारी।

  2. दिल्ली की गणेश फार्मा से यूपी सप्लाई चेन पर फोकस।

  3. ई-वे बिल, बैंक खातों से नेटवर्क का खुलासा होगा।

जागरण संवाददाता, बांदा। नौ करोड़ रुपये के कोडीनयुक्त कफ सीरप प्रकरण में तीन सितंबर को पुनाहुर के पास 250 पेटी की बरामदगी के बाद जांच एक अहम मोड़ पर है।

12 दिन बाद भी कार्रवाई पांच गिरफ्तार आरोपितों तक सीमित है, जबकि पूछताछ में 10 से 15 लोगों के नेटवर्क और इससे पहले करीब छह करोड़ रुपये की दो खेप खपाए जाने की बात सामने आ चुकी है।

ऐसे में अब जांच की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बरामद डीसीएम से मिले ई-वे बिल और उसके पीछे दर्ज कारोबार की है। दिल्ली की गणेश फार्मा के जीएसटी बिल, बिक्री रिकार्ड और बैंक खातों की जांच से यह पता चल सकता है कि कोडीनयुक्त सीरप की सप्लाई उत्तर प्रदेश के किन-किन जिलों तक हुई और रकम किन खातों में पहुंचती रही।

बरामद डीसीएम डीएल 01 एलएए 5482 के चालक के पास मिले ई-वे बिल में दिल्ली की गणेश फार्मा से हमीरपुर के टेढ़ा स्थित ओम मेडिकल एजेंसी के नाम सीरप भेजा जाना दर्ज है।

वहीं शीशियों के रैपर पर हिमाचल प्रदेश की विंग बायो टेक एलएलपी का नाम अंकित है। इससे दवा के निर्माण और सप्लाई से जुड़ी कंपनियों की कड़ी सामने आती है। अब असली सवाल यह है कि बिल में दर्ज फर्म तक माल पहुंचा या रास्ते में उसका रुख बदल गया।

गणेश फार्मा के पुराने बिल सबसे अहम

गणेश फार्मा के पुराने जीएसटी रिटर्न, बिक्री बिल और ई-वे बिल खंगालने पर यह सामने आ सकता है कि कंपनी ने उत्तर प्रदेश की किन फर्मों को लगातार बड़ी मात्रा में कफ सीरप भेजा। किसी एक फर्म, मोबाइल नंबर, पते या बैंक खाते की बार-बार मौजूदगी मिलने पर पुरानी खेपों की कड़ी भी जोड़ी जा सकती है। यही रिकार्ड यह भी बता सकता है कि किन जिलों में सबसे ज्यादा सप्लाई हुई। यदि एक ही समय में बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट, महोबा, फतेहपुर या दूसरे जिलों की फर्मों के नाम सामने आते हैं तो जांच का दायरा एक जनपद से निकलकर पूरे प्रदेश तक पहुंच सकता है।

छह करोड़ की पुरानी खेपों का हिसाब अभी बाकी

बिसंडा: जांच में तीन सितंबर से पहले करीब तीन-तीन करोड़ रुपये की दो खेप खपाए जाने की बात सामने आई है। इन दोनों खेपों का पूरा हिसाब सामने आना इसलिए जरूरी है क्योंकि इनसे पुराने खरीदार और सप्लाई के रास्ते का पता लग सकता है।

किस तारीख को माल निकला, किस वाहन से गया, किस फर्म के नाम बिल बना और भुगतान किस खाते से हुआ, इन सभी कड़ियों को मिलाने पर नेटवर्क की वास्तविक तस्वीर बन सकती है।

यदि पुरानी खेपों और तीन सितंबर को पकड़ी गई खेप के दस्तावेजों में एक जैसे वाहन, फर्म, संपर्क नंबर या बैंक खाते मिलते हैं तो यह महज संयोग नहीं रहेगा, बल्कि सप्लाई की निरंतरता की जांच की मजबूत कड़ी बन सकता है।

ई-वे बिल में दर्ज दो वाहनों की भी पड़ताल जरूरी

बरामद डीसीएम डीएल 01 एलएए 5482 के अलावा ई-वे बिल में डीएल 01 एलएआर 8087 और डीएल 01 एलएक्स 3487 भी दर्ज हैं। इन दोनों वाहनों के पुराने ई-वे बिल, टोल रिकार्ड और उपलब्ध आवाजाही के विवरण का मिलान किया जाए तो यह पता चल सकता है कि क्या इनका इस्तेमाल पहले भी इसी तरह की खेपों में हुआ था। इससे परिवहन की पूरी कड़ी सामने आने की संभावना है।

कागजों में हमीरपुर, असली माल कहां गया

ओम मेडिकल एजेंसी के नाम तैयार ई-वे बिल जांच के लिए सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में है। अब संबंधित एजेंसी के खरीद बिल, स्टाक रजिस्टर और बिक्री रिकार्ड से इसका मिलान किया जाना चाहिए। कागज पर जितनी मात्रा खरीदी गई, क्या उतनी ही मात्रा स्टाक में दर्ज हुई और आगे किसे बेची गई, इससे वास्तविक आपूर्ति का पता लगाया जा सकता है। यही जांच यह स्पष्ट कर सकती है कि मेडिकल एजेंसी केवल कागजी खरीदार थी या माल वास्तव में वहीं पहुंचा।

अतर्रा की एजेंसियां भी महत्वपूर्ण कड़ी

प्रकरण में अतर्रा की श्याम मेडिकल एजेंसी, कल्लूराम की श्री राम मेडिकल एजेंसी और प्रवीण उर्फ लकी से जुड़ी मामा मेडिकल एजेंसी के नाम सामने आए हैं। इनके पुराने खरीद-बिक्री रिकार्ड, स्टाक और भुगतान का मिलान करने पर यह पता चल सकता है कि इन एजेंसियों तक सीरप किस माध्यम से पहुंचा और आगे किन लोगों को दिया गया। अतर्रा से जुड़े रिकार्ड की तुलना गणेश फार्मा के बिलों से हुई तो दिल्ली से बुंदेलखंड तक की सप्लाई लाइन और स्पष्ट हो सकती है।

बैंक खातों से खुलेगा रकम का रास्ता

माल की आवाजाही के साथ पैसे की आवाजाही भी जोड़ना जरूरी है। गणेश फार्मा, संबंधित मेडिकल एजेंसियों और गिरफ्तार आरोपितों के बैंक खातों की जांच से भुगतान करने वालों और रकम पाने वालों की पहचान हो सकती है।

बड़ी रकम के जमा-निकासी की तारीख यदि ई-वे बिल या माल भेजे जाने की तारीख से मेल खाती है तो सौदे की कड़ी और मजबूत हो सकती है। इसी प्रक्रिया में बिचौलियों और उन लोगों तक पहुंचने का रास्ता भी खुल सकता है, जो सीधे दवा की खेप नहीं लेते थे, लेकिन भुगतान या आपूर्ति की व्यवस्था संभालते थे।

पांच गिरफ्तारी के बाद अगली कड़ी पर नजर

अब तक गिरफ्तार आरोपितों में बिसंडा के नाहर पुरवा निवासी धीरेंद्र पुत्र भगवत, अतर्रा के लखन कालोनी निवासी प्रवीण उर्फ लकी पुत्र स्व. दयाराम, अतर्रा के रामलीला मैदान निवासी रोहित पुत्र कल्लूराम, हापुड़ के बहादुरगढ़, ग्राम भैना निवासी शेखर पुत्र राजकुमार और अतर्रा के कुशवाहा मैरिज हाल के पास निवासी प्रियांशु उर्फ किशन पुत्र मुन्ना शामिल हैं। मुख्य आरोपित प्रियांशु के बहनोई हमीरपुर के रविंद्र गुप्ता की अभी तक गिरफ्तारी नहीं हुई है।

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