जागरण संवाददाता, बांसडीह (बलिया) : बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा सिर्फ कागजों में सिमट कर रह गया है। आज भी कई घरों की छोटी-छोटी बालिकाएं सुबह उठते ही घर-गृहस्थी के काम में लग जाती है। हद तो तब हो जाती है जब पेट की आग बुझाने के लिए नन्हें व कोमल हाथ सड़क पर कूड़ा बीनते नजर आते हैं।

बात यही नहीं खत्म होती कुछ ऐसी भी हैं जो अपने वजन से अधिक का ठेला खिच कर परिवार के भरण पोषण में अपना अंशदान करती हैं। ऐसा नजारा प्रतिदिन देखने को मिलता है। जहां सम्पन्न परिवारों की लड़कियां सुबह साफ सुथरे परिधानों में कंधे पर बैग लटकाए स्कूल की ओर रवाना होती हैं वहीं कचहरी चौराहे पर सप्तर्षि गेट के आसपास दो बहनें पीठ पर बोरी टांगी कुड़े के ढ़ेर में जिदगी तलाशती नजर आती हैं। यह तो बानगी भर है। स्कूल चलो अभियान और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान को मुंह चिढ़ाती ऐसी तस्वीरें आए दिन देखने को मिल जाती हैं।

कूड़े के ढ़ेर से प्लास्टिक की थैलियों व कार्टूनों को चुनती बालिकाओं ने बताया कि इससे घर-गृहस्थी में कुछ सहयोग हो जाता है। स्कूल जाने से पेट थोड़े ही भरेगा। सरकारी हुक्मरानों के लिए भले ही यह तस्वीर मामूली नजर आएं लेकिन इसने एक बात तो स्पष्ट कर दी कि नीतियों व कार्यकर्मों का क्रियान्वयन समाचार पत्रों तक सिमट कर रह गया है। शिक्षा से वंचित छात्र-छात्राओं के लिए बेसिक शिक्षा विभाग जहां अभियान चलाने का दावा करता है वहां इस प्रकार की तस्वीर कई प्रकार का प्रश्न खड़ा करता है। जिसका जबाब शायद जिम्मेदारों के पास नहीं है।

Posted By: Jagran

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