44 साल बाद भी पूरी नहीं हुई चकबंदी, बलिया में किसानों पर मंडराया सरकारी योजनाओं से वंचित होने का खतरा
बलिया के पूर गांव में 44 साल से अधिक समय से चकबंदी प्रक्रिया अधूरी है, जिससे धारा-52 का प्रकाशन रुका ...और पढ़ें

इस फोटो को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।
HighLights
पूर गांव में 44 साल से चकबंदी प्रक्रिया अधूरी।
धारा-52 का प्रकाशन न होने से किसान परेशान।
हजारों किसान डिजिटल सुविधाओं और सरकारी योजनाओं से वंचित।
जागरण संवाददाता, पूर (बलिया)। जनपद की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत पूर में चकबंदी प्रक्रिया शुरू हुए 44 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अब तक धारा-52 का प्रकाशन नहीं हो सका है। चकबंदी अभिलेखों के लंबित रहने से हजारों चकदार किसान भूमि संबंधी डिजिटल सुविधाओं से वंचित हैं। वहीं कई चकदार ऐसे भी हैं, जिन्हें अब तक आवंटित चकों पर कब्जा नहीं मिल सका है।
ग्राम पूर में चकबंदी का गजट वर्ष 1982 में हुआ था। इसके बाद धारा-23 और 24 के तहत कब्जा परिवर्तन की प्रक्रिया वर्ष 2014 में पूरी हुई। इसके बावजूद डीडीसी स्तर पर निगरानी के लंबित मामलों के कारण धारा-52 का प्रकाशन नहीं हो सका। इससे चार दशक बाद भी चकबंदी प्रक्रिया अधूरी पड़ी है।
शासन के निर्देश पर पुराने राजस्व और चकबंदी अभिलेखों के डिजिटलीकरण की प्रक्रिया शुरू होने से किसानों को उम्मीद जगी थी। गांव में करीब 5459 चकदार किसानों की फार्मर आईडी बनने का रास्ता इससे साफ होना है।
फार्मर आईडी बनने के बाद किसानों को कृषि विभाग सहित विभिन्न सरकारी योजनाओं में मिलने वाले अनुदान और अन्य सुविधाओं का लाभ मिल सकेगा। हालांकि अभिलेखीय विसंगतियों और डिजिटलीकरण की धीमी गति के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।
रामनारायण, मानिक चांद, मारकंडेय सिंह, विजय राम सहित कई चकदार आज भी अपने चकों पर कब्जे के लिए विभाग के चक्कर लगा रहे हैं। किसानों ने लंबित अभिलेखीय कार्य शीघ्र पूरा कराने, फार्मर आइडी बनाने की प्रक्रिया तेज करने और कब्जे से वंचित चकदारों को उनके चकों पर कब्जा दिलाने की मांग की है।
