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155 साल बाद कनाड़ा की चौथी पीढ़ी ने खोज निकाली अपनी बल‍िया की जड़ें, 15 द‍िन की तलाश के बाद म‍िला पैतृक ठिकाना

By Vns Milan K. Gupta Edited By: Abhishek sharma
Published: Sun, 04 Oct 2026 06:12 PM (IST)

कनाडा के टोरंटो से आए एक दंपती ने 155 साल बाद बलिया में अपने पूर्वजों का पैतृक ठिकाना खोज निकाला। ...और पढ़ें

कनाडा की चौथी पीढ़ी ने 155 साल बाद बलिया में खोजी अपनी पैतृक जड़ें।

कनाडा की चौथी पीढ़ी ने 155 साल बाद बलिया में खोजी अपनी पैतृक जड़ें।

HighLights

  1. कनाडा के दंपती ने 155 साल बाद बलिया में पैतृक घर खोजा।

  2. 1871 के पुराने इमिग्रेशन पेपर से मिली पूर्वजों की जानकारी।

  3. खरसरा ग्राम पंचायत के बेलौना टोला में मिली परिवार की जड़ें।

जागरण संवाददाता, पूर (बलिया)। करीब 155 साल पहले एक परिवार की जड़ें बलिया से निकलकर कलकत्ता और वहां से कनाडा की धरती पर जा बसीं। पीढ़ियां बदलती गईं, लेकिन पूर्वजों की जन्मभूमि को देखने की चाह परिवार के दिल में बनी रही। आखिरकार 1871 की एक पुरानी पर्ची पर दर्ज पते ने कनाडा की चौथी पीढ़ी को बलिया तक पहुंचा दिया।

करीब 15 दिन की खोजबीन के बाद खरसरा ग्राम पंचायत के बेलौना टोला में कनाडा के टोरंटो से आए दंपती 75 वर्षीय इमतेज व वर्नी अलाय को अपने पूर्वजों का पैतृक ठिकाना मिल गया। जन्मभूमि की मिट्टी पर कदम रखते ही उनकी आंखों में खुशी छलक उठी। हालांकि उन्हें घर का पता नहीं मिला और न ही कोई उनके परिवार से यहां रहता है।

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टोरंटो निवासी इमतेज और उनकी पत्नी के साथ शनिवार को खरसरा ग्राम पंचायत के पंचायत सचिव मिथिलेश कुमार पांडेय से मिले। उनके पास वर्ष 1871 की एक पुरानी इमिग्रेशन पेपर थे, जिस पर अंग्रेज अधिकारी के हस्ताक्षर और पता दर्ज था। इसी दस्तावेज को आधार बनाकर स्थानीय स्तर पर करीब 15 दिनों तक खोजबीन की गई। आखिरकार सुराग खरसरा के बेलौना टोला तक पहुंचा। पंचायत सचिव ने विदेशी मेहमानों को उनके पूर्वजों के गांव तक पहुंचाया।

14 वर्ष की उम्र में छूटी थी जन्मभूमि, पीढ़ियों बाद लौटे वंशज
इमतेज के अनुसार उनके परिवार की परदादी सोमेरिया, उनकी बहन मुराचिया और उनके भाई कौलू यहीं से कोलकाता गए थे। इसके बाद 1871 में गिरमिटिया मजदूर के रूप में कलकत्ता से कनाडा भेज दिए गए जिसका इमिग्रेशन पेपर है। उस समय उनकी उम्र महज 14 वर्ष थी। परिवार के अन्य भाई-बहनों की उम्र करीब 10 और आठ वर्ष बता रहे हैं। उस दौर की यादों से जुड़ी 1871 की पर्ची को परिवार ने पीढ़ियों से संभालकर रखा था।

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पूर्वजों की धरती और गांव की गलियां देखकर कनाडा से आए वंशज भावुक हो उठे। भाषा की दूरी के बावजूद ग्रामीणों से मिलने और जन्मभूमि को देखने का उनका उत्साह देखते ही बन रहा था। अपनी जड़ों की तलाश में हुई यह यात्रा परिवार के लिए अतीत से जुड़ने का भावुक पल बनी, वहीं गांव के लोगों के लिए भी यह घटना कौतूहल और आत्मीयता से भरी रही।

उस समय गाजीपुर का हिस्सा हुआ करता था, तब बलिया अलग नहीं हुआ था
इमतेज के मुताबिक ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान, कोपाचित यूनाइटेड प्रोविंस में एक प्रमुख और बड़ा राजस्व परगना (प्रशासनिक उप-विभाग) था। यह मूल रूप से गाजीपुर जिले के अंतर्गत आता था, लेकिन 1879 में इसे स्थायी रूप से नए बने बलिया जिले में स्थानांतरित कर दिया गया। भूमि राजस्व वसूली को बेहतर बनाने के लिए, अंग्रेजों ने इस बड़े परगने को दो अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया।

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कोपाचित पश्चिम यानी इस हिस्से को रसड़ा तहसील में मिला दिया गया। वहीं कोपाचित पूर्व 1882 में सीमाओं के पुनर्गठन के दौरान बनाए गए, जिसके हिस्से में 212 गांव शामिल थे और इसे बलिया सदर तहसील के अंतर्गत रखा गया। इस परगने में पारंपरिक रूप से कुशवाहा और कौशिक राजपूत वंशों का वर्चस्व था, जो ब्रिटिश राज को राजस्व देने वाले मुख्य जमींदार थे।

एचआर नेविल द्वारा संपादित 1907 के बलिया जिला गजेटियर में दर्ज सबसे उल्लेखनीय गांवों में शामिल हैं। खरसरा ग्राम पंचायत के बेलौना टोला को को औपनिवेशिक राजस्व मुख्यालयों में एक प्रमुख प्रशासनिक कस्बे के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया था, लेकिन यह एक अलग कृषि राजस्व गांव (मौजा) के रूप में मौजूद था। आज यह बेलौना ज़िले के पंदह ब्लाक में स्थित है।