यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 20, 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
अनपढ़ मां की बिटिया ने बदल दी गांव की हुलिया
बहराइच : भारत-नेपाल सीमा से सटे यह उस गोकुलपुर गांव की कहानी है, जिसकी तस्वीर व तकदीर

बहराइच : भारत-नेपाल सीमा से सटे यह उस गोकुलपुर गांव की कहानी है, जिसकी तस्वीर व तकदीर गांव की ही अनपढ़ मां की बेटी ने बदल दी। जी हां, दकियानूसी परंपराओं की बेड़ियों में जकड़ी निरक्षरता का बोझ ढो रहीं इस गांव की लड़कियों को इल्म की रोशनी में लाने का अनअथक प्रयास रंग लाया। आज गांव की 74 बालिकाएं हर रोज गोकुलपुर से रूपईडीहा की उड़ान अपने सपनों के साथ करती हैं।
नवाबगंज ब्लॉक का 1500 की आबादी वाला यह गांव शिक्षा के क्षेत्र में बेहद पिछड़ा था। सभी लोग खेती, किसानी व मजदूरी कर गुजारा करते हैं। खासकर लड़कियों की शिक्षा दकियानूसी परंपराओं में उलझ कर रह गई थी। कक्षा पांच तक तो लोग गांव में बेटियों को पढ़ाने के लिए तो राजी थे, लेकिन प्राइमरी के बाद बच्चियों को बाहर भेजना अपनी परंपरा और मान-मर्यादा के खिलाफ समझते थे। इन रूढि़यों से हटकर गांव की अनपढ़ मां पुष्पा देवी अपनी बेटी कल्पना को आगे पढ़ाने का निर्णय लिया तो पिता दाताराम ने भी हामी भर ली। बच्ची का एडमिशन रुपईडीहा में करवाया तो गांव के लोग उल्टी-सीधी बातें करने लगे। सामाजिक दबाव पर दाताराम ने भी सोचा कि सयानी लड़की साइकिल से रूपइडीहा तक पढ़ने जाए यह ठीक नहीं। इसी बीच गांव में देहात संस्था की ओर से बाल संसद का चुनाव कराया गया। बड़े लोगों का चुनाव आयोग बनाया गया। इच्छुक बाल नेतृत्वकर्ताओं से छह पदों के लिए नामाकंन मांगे गए। उस वक्त कल्पना को ऐसा लगा कि उसके सपनों को साकार करने का मौका आ गया है। पीएम के लिए उसने नामांकन दाखिल किया। गोपनीय मतदान हुआ। कल्पना पीएम चुनी गई। इसके बाद कल्पना ने बालिकाओं की दशा बदलने को ठान ली। 'तू न चलेगा, तो चल देंगी राहें, मंजिल को तरसेंगी तेरी निगाहें' का मंत्र देने के साथ कल्पना ने बालिकाओं के मां-बाप को शिक्षा के लिए प्रेरित करना शुरू किया। स्वयं को आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया। बाल संसद टोली की संध्या, नीतू, अनीता व सुलोचना के साथ कल्पना घर-घर जाकर मां-बाप के मानसिकता को शिक्षा के प्रति बदलने का प्रयास शुरू किया। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के साथ मिलकर बच्चों के नामांकन व ठहराव का कल्पना ने अलख जगाया। गांव में धीरे-धीरे बदलाव आया। 58 बालिकाओं के मां-बाप ने उच्च शिक्षा के लिए बेटियों को आगे ले जाने का फैसला लिया। इस सत्र जुलाई में प्राथमिक विद्यालय के प्रधान शिक्षक ने कक्षा पांच पास 18 बालिकाओं की सूची कल्पना को सौंपी है कि इनका एडमिशन कक्षा छह में कराया जा सके। आज गांव की 74 बालिकाएं नौ किमी दूर रूपईडीहा की उड़ान रोज अपने सपनों के साथ करती हैं। कल्पना कहती हैं कि शिक्षा के साथ ही गांव को आदर्श गांव बनाने का उनका सपना है। देहात संस्था के मुख्य कार्यकारी डॉ.जितेंद्र चतुर्वेदी कहते हैं कि कल तक जो ताने देते थे, आज वह कल्पना की तारीफ करते नहीं चूकते।
