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45 साल बाद चकबंदी का अंतिम पड़ाव, बागपत में किसानों को मिलेगा मालिकाना हक; अभिलेख तैयार

Published: Sat, 10 Oct 2026 07:21 PM (IST)

बागपत के बरनावा गांव में 1981 से चल रही 45 साल पुरानी चकबंदी प्रक्रिया अब अंतिम चरण में है, जिससे किसानों को वर्षों के संघर्ष के बाद राहत मिली है।

बड़ौत चकबंदी कार्यालय में जीर्णशीर्ण हालत में रखा 45 साल पुराना रजिस्टर। जागरण

बड़ौत चकबंदी कार्यालय में जीर्णशीर्ण हालत में रखा 45 साल पुराना रजिस्टर। जागरण

HighLights

  1. बरनावा में 45 साल पुरानी चकबंदी प्रक्रिया अंतिम चरण में।

  2. किसानों ने मालिकाना हक के लिए हाईकोर्ट तक लड़ाई लड़ी।

  3. अंतिम अभिलेख तैयार होने से किसानों को मिलेगी राहत।

राजीव पंडित, बागपत। बरनावा गांव में वर्ष 1981 में शुरू हुई चकबंदी प्रक्रिया अब अंतिम पड़ाव पर पहुंच गई है। लगभग 45 साल से चल रही प्रक्रिया के दौरान कई किसानों ने अपनी जमीन पर मालिकाना हक और कब्जा पाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। चकबंदी न्यायालय से लेकर हाईकोर्ट तक मुकदमे चले।

इस संघर्ष में किसानों को जहां बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा, वहीं कई परिवारों के बीच जमीन को लेकर विवाद और मनमुटाव भी बढ़े। कुछ किसान ऐसे भी रहे, जो अपना हक पाने के लिए संघर्ष करते-करते दुनिया से विदा हो गए, लेकिन चकबंदी पूरी होते नहीं देख सके।

बरनावा में लगभग 3075 एकड़ कृषि भूमि और लगभग 1900 किसान हैं। इतने बड़े भूभाग और बड़ी संख्या में किसानों से जुड़ी चकबंदी लंबे समय से चर्चा में रही है। किसानों को जमीन के चक और कब्जे से संबंधित मामलों में परेशानी उठानी पड़ी।

मुकदमे लड़ने के लिए कई किसानों को ब्याज पर रुपये तक लेने पड़े। इससे कुछ किसान कर्ज के बोझ में दब गए। मुकदमेबाजी में पैसा खर्च होने के साथ उनका समय भी अदालतों और चकबंदी कार्यालयों के चक्कर लगाने में बीता।

वर्ष 2014 में अटक गई थी प्रक्रिया

वर्ष 2014 में कब्जा परिवर्तन के बाद चकबंदी फाइनल होने की स्थिति में पहुंच गई थी, लेकिन इसी दौरान कुछ किसान हाईकोर्ट पहुंच गए। इसके बाद मामला रिमांड पर आने के चलते वर्ष 2015 में दोबारा चकबंदी प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी। इससे प्रक्रिया और लंबी खिंच गई।

चकबंदी कार्यालय में रखे पुराने रजिस्टर भी अब जीर्ण-शीर्ण हालत में पहुंच गए हैं। स्टाफ की कमी और धीमी गति से काम होने के कारण किसानों को लंबे समय तक अंतिम अभिलेखों का इंतजार करना पड़ा। इस दौरान अधिकारियों पर प्रभावशाली किसानों से मिलीभगत के आरोप भी लगते रहे।

अब तैयार हो रहा अंतिम अभिलेख

अब चकबंदी विभाग में अंतिम अभिलेख यानी बंदोबस्त तैयार करने की कार्रवाई चल रही है। अभिलेख तैयार होने के बाद डाटा तहसील भेजा जाएगा। वहां कंप्यूटर में फीडिंग की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इसके बाद किसान तहसील से अपना राजस्व रिकार्ड प्राप्त कर सकेंगे।

अंतिम रिकार्ड तैयार होने से किसानों को जमीन संबंधी विवरण स्पष्ट होने और भविष्य में राजस्व कार्यों में सुविधा मिलने की उम्मीद है। वहीं, किसान सरजीत सिंह का कहना है कि चकबंदी फाइनल होने की स्थिति में पहुंचने से किसानों ने बड़ी राहत की सांस ली है। किसान चाहते हैं कि प्रक्रिया इसी साल पूरी हो जाए, ताकि उन्हें वर्षों पुरानी परेशानी से छुटकारा मिल सके।

वर्ष 1981 से चली आ रही चकबंदी प्रक्रिया को फाइनल करने के लिए बरनावा के अभिलेख तैयार करने की कार्रवाई युद्धस्तर पर चल रही है। स्टाफ की कमी जरूर है, लेकिन उम्मीद है कि इसी साल रिकार्ड फाइनल कर तहसील को भेज दिया जाएगा। परेशानी पुराने उन अभिलेखों में हो रही है, जो जीर्ण-शीर्ण हालत में पहुंच गए हैं।

-हरेंद्र सिंह, सहायक चकबंदी अधिकारी, बागपत।

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