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Baghpat Seat Result: बदले समीकरणों को भाप गए थे जयन्त, RLD की अपने गढ़ में वापसी; BJP के साथ से मिली संजीवनी

Baghpat Lok Sabha Seat Winner जयन्त चौधरी राजनीतिक नफा-नुकसान का आकलन कर चुनाव से ऐन पहले एक बार फिर भाजपा के साथ आए। इसका उन्हें लाभ भी मिला। उप्र सरकार में पार्टी विधायक अनिल कुमार कैबिनेट मंत्री बनाए गए। इस समझौते के तहत एक विधान परिषद सीट भी उसे मिल गई। सबसे बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम चौ. चरण सिंह को भारत रत्न मिलना रहा।

By Aysha Sheikh Edited By: Aysha Sheikh Tue, 04 Jun 2024 05:26 PM (IST)
Baghpat Seat Result: बदले समीकरणों को भाप गए थे जयन्त, RLD की अपने गढ़ में वापसी; BJP के साथ से मिली संजीवनी
Baghpat Seat Result: बदले समीकरणों को भाप गए थे जयन्त, RLD की अपने गढ़ में वापसी

आशु सिंह, बागपत। रालोद और बागपत एक-दूसरे के पर्याय हैं। यह भारत रत्न चौ. चरण सिंह की कर्मभूमि रही। उनके पुत्र अजित सिंह यहां से सात बार सांसद चुने गए। 2014 और 2019 लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में रालोद ने अपना यह गढ़ गंवा दिया। पूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर डा. सत्यपाल सिंह ने पहले अजित सिंह और फिर उनके पुत्र जयन्त चौधरी को हार का मुंह दिखाया। जयन्त चौधरी बागपत सीट पर बदले समीकरणों को भांप गए थे। इसी कारण उन्होंने भाजपा से हाथ मिलाया और इस बार अपना गढ़ वापस लेने में सफल हुए।

चरण सिंह 1967 से 1974 तक छपरौली से तीन बार विधायक चुने गए। छपरौली सीट बागपत जनपद में आती है। चौधरी साहब 1967 में छपरौली से जनप्रतिनिधि रहते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। बागपत से सांसद रहते हुए 28 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980 तक प्रधानमंत्री का दायित्व संभाला। 1987 में चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद उनकी विरासत को उनके पुत्र अजित सिंह ने संभाला।

1989 से 2009 तक सात बार बागपत सीट से सांसद चुने गए। वे वीपी सिंह सरकार, अटल सरकार व मनमोहन सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे। 1999 में चौ. अजित सिंह ने राजनीतिक पार्टी राष्ट्रीय लोकदल का गठन किया जिसकी बागडोर 2021 में उनके निधन के बाद से उनके पुत्र जयन्त चौधरी के हाथ में है।

1999 में पूर्व केंद्रीय मंत्री चौ. अजित सिंह ने पार्टी का गठन किया था। गैर मान्यता प्राप्त दल से शुुरुआत करने वाले दल को पिछले वर्ष राज्य पार्टी का दर्जा भी गंवाना पड़ा। 18वीं लोकसभा के लिए पार्टी अपने इतिहास की न्यूनतम दो सीटों- बागपत और बिजनौर पर चुनाव लड़ी। जयन्त चौधरी या उनकी पत्नी के चुनाव न लड़ने से उनके समर्थक निरशा हुए थे क्योंकि जनभावनाएं इस परिवार के साथ जुड़ी हैं। दूसरी तरफ, यह एक सकारात्मक पहलू रहा कि पार्टी ने ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया जो इसके प्रति वर्षों से निष्ठावान रहे।

वर्ष 1999 में 13वीं लोकसभा के लिए रालोद ने पहली बार चुनाव लड़ा। इसमें सात सीटों पर उम्मीदवार उतारे जिसमें उसे दो पर जीत मिली। बागपत से अजित सिंह और कैराना से अमीर आलम। तब उसका भाजपा के साथ गठबंधन था। अजित सिंह अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय कृषि मंत्री भी बने। 2002 के उप्र विधानसभा चुनाव में भी रालोद का भाजपा से गठबंधन रहा। इस चुनाव में वह 38 विस सीटों पर लड़ी और 14 पर जीत दर्ज की। 2003 में अजित सिंह ने भाजपा से गठबंधन खत्म कर सपा का साथ दिया।

मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने सपा के तीन विधायकों अनुराधा चौधरी, कोकब हमीद और स्वामी ओमवेश को मंत्रिमंडल में स्थान दिया। 2004 का लोकसभा चुनाव भी रालोद और सपा ने मिलकर लड़ा। इसमें वह सर्वाधिक 10 सीटों पर लड़ी जिसमें उसे तीन सीटों पर सफलता मिली। बागपत से अजित सिंह, बिजनौर से मुंशीराम और कैराना से अनुराधा चौधरी।

2007 के उप्र विधानसभा चुनाव में पार्टी अकेले मैदान में उतरी और सर्वाधिक 254 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। इसमें उसने 10 सीटों पर जीत दर्ज की। 2009 लोस चुनाव में अजित सिंह ने फिर भाजपा से गठबंधन किया और सात में से पांच सीटों पर सफलता प्राप्त की। यह लोस चुनाव में रालोद के इतिहास का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। लेकिन 2011 में अजित सिंह यूपीए के साथ हो लिए। सरकार में उन्हें केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री बनाया गया। 2012 के उप्र विस चुनाव में भी रालोद और कांग्रेस का साथ बना रहा और उसने 46 में से नौ सीटों पर कामयाबी हासिल की।

2014 लोकसभा चुनाव में भी रालोद और कांग्रेस में गठबंधन रहा, लेकिन इस बार अजित सिंह का दांव उल्टा पड़ गया। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद हुए इस चुनाव में नरेन्द्र मोदी का जादू सिर चढ़कर बोला और भाजपा की आंधी में विपक्ष धराशायी हो गया। रालोद आठों सीटों पर हार गया। अजित सिंह और जयन्त चौधरी खुद चुनाव हार गए। यहां से रालोद ढलान पर आनी शुरू हो हुई जो अब तक उबरने की कोशिश कर रही है।

सपा-बसपा के साथ गठबंधन कर 2019 में भी तीनों लोकसभा सीटें हार गई। 2021 में अजित सिंह के निधन के बाद पार्टी की कमान जयन्त चौधरी के हाथ में आई। 2022 उप्र विस चुनाव में सपा-बसपा के साथ गठबंधन में उसे उबरने का अवसर मिला। उसे इन चुनावों में 33 में से नौ सीटों पर सफलता मिली थी। इसके बाद हुए निकाय चुनाव में रालोद ने अकेले 50 नगर निकायों में किस्मत आजमाई और अपने 22 अध्यक्ष बनवाने में सफल हुई।

जयन्त चौधरी राजनीतिक नफा-नुकसान का आकलन कर चुनाव से ऐन पहले एक बार फिर भाजपा के साथ आए। इसका उन्हें लाभ भी मिला। उप्र सरकार में पार्टी विधायक अनिल कुमार कैबिनेट मंत्री बनाए गए। इस समझौते के तहत एक विधान परिषद सीट भी उसे मिल गई। सबसे बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम चौ. चरण सिंह को भारत रत्न मिलना रहा।