शहीद शाहमल के 155वें शहादत दिवस पर विशेष ..

1857 की क्रांति में अंग्रेजों के किए थे दांत खट्टे

बिजरौल में एक साथ दी थी 32 क्रांतिकारियों को फांसी

जागरण कार्यालय, बागपत : 1857 की क्रांति में अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिलाने वाले शहीद बाबा शाहमल इतने बहादुर थे कि उनके शव से भी फिरंगी कांप उठे थे। बाबा को उठाने की हिम्मत न जुटा पाने वाले कई गोरों को उनकी ही सरकार ने मौत के घाट उतार दिया था।

10 मई 1857 को मेरठ से शुरू हुई क्रांति की आग बागपत और बड़ौत क्षेत्र में भी फैली। क्रांतिकारी शाहमल के नेतृत्व में हजारों किसानों ने बड़ौत तहसील पर हमला बोलकर सरकारी खजाना लूट लिया था। भारत में क्रांतिकारियों की अगुवाई करने वाले अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर ने दिल्ली दरबार से शाहमल को बड़ौत क्षेत्र का सूबेदार नियुक्त किया। इसके बाद अंग्रेजों को रसद पहुंचाने के लिए प्रयोग किया जाने वाला बागपत में यमुना किनारे बना नाव का पुल बारूद से उड़ा दिया गया।

कई बार अंग्रेजी हुकूमत के दांत खट्टे करने वाले बाबा शाहमल पर 18 जुलाई 1857 में बड़का गांव के जंगल में हमला बोल दिया। एटोनॉकी नामक फ्रांसीसी सैनिक के हमले में बाबा शहीद हो गए। अंग्रेज कमांडर बिलियम द्वारा लिखी गई 'आंखों देखी' पुस्तक में बताया गया कि गोरों की फौज घंटों तक शाहमल के शव से भी डरती रही। शहादत स्थल पर आये हुक्मरानों ने अपने सैनिकों का यह व्यवहार देख उन पर ही गोलियां बरसा दी थीं।

यहां दी थी फांसी

बिजरौल गांव में वह पेड़ आज भी क्रांतिकारियों के उस जज्बे का गवाह है, जहां एक साथ 32 क्रांतिकारियों को अंग्रेजी सरकार ने फांसी पर लटकाया था। बड़ौत के शहजाद राय शोध संस्थान में 1857 की क्रांति से संबंधित कई प्रमाण मौजूद हैं।

इतिहासकार बोले..

संस्थान के निदेशक अमित राय जैन ने बताया कि आज बिजरौल गांव में कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। उनकी शाहदत को शत-शत नमन करते हुए उन्होंने कहा कि बाबा ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर दिया था।

बसौद में होगा कार्यक्रम

क्रांतिकारी गांव बसौद में भी मंगलवार को शहादत दिवस पर कार्यक्रम होगा। सोमवार को वहां ग्रामीणों ने मशाल जुलूस निकाला। कार्यक्रम में इतिहासकारों समेत कई बड़ी हस्तियां शिरकत करेंगी।

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