जेएनएन, बदायूं : दिल्ली में हुए निर्भया कांड के चारों दोषियों को फांसी हो गई। इनके अलावा एक दोषी बदायूं के इस्लामनगर के गांव का भी रहने वाला था। घटना के वक्त वह नाबालिग था, इसलिए उसे तीन साल की सजा हुई और बाल सुधार गृह में रखा गया। वहां से छूटा तो गांव आने की कोशिश की मगर ग्रामीणों ने पहले ही कह दिया कि उसे घुसने नहीं देंगे। बहिष्कार का एलान कर दिया था, इसलिए वह गांव नहीं आया। अब वह दिल्ली में कहीं है। परिवार के लोग भी संपर्क नहीं करते।

परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। वह वर्ष 1995 में ही घर से निकल गया। दिल्ली पहुंचा और वहां वहीं बस अड्डे पर बसों की सफाई करने लगा। वर्ष 2012 में जब निर्भया कांड हुआ, तब वह दोषियों के साथ शामिल था। उस दौरान उसकी उम्र 17 साल थी। उसकी गिरफ्तारी हुई तो गाव के प्राइमरी स्कूल में तफ्तीश पहुंची, कागजों के आधार पर उसे नाबालिग माना गया। जिसके बाद अदालत ने उसे घटना में दोषी मानते हुए तीन साल के कारावास की सजा सुनाई थी। उसे दिल्ली के बाल सुधार गृह में रखा गया था, लेकिन परिवार के लोग कभी मिलने नहीं गए। पिछले साल 22 दिसंबर को सजा पूरी होने के बाद वह गांव आने की तैयारी में था। लोगों ने पहले ही विरोध जता दिया था इसलिए गांव नहीं आया। शर्मिदगी के कारण परिवार के लोगों ने भी यहां आने की पैरवी नहीं की।

शुक्रवार को जब जागरण टीम उसके गांव पहुंची तो मां, पिता और दोनों भाई गुमसुम बैठे थे। उसके बारे में चर्चा की तो बिना बोले उठकर चले गए। हालांकि बाद में मां बोली कि उसने ऐसा कृत्य किया होगा, ऐसा कभी विश्वास नहीं हुआ। हम सब शर्मिदा है, इसलिए कभी उससे संपर्क भी नहीं किया। अब वह दिल्ली में कहां है, यह नहीं पता।

ग्रामीणों का कहना है कि वह बचपन में ही चला गया था इसलिए बहुत ज्यादा जानकारी नहीं। मगर, निर्भया कांड के बाद उसके नाम से नफरत हो गई।

Posted By: Jagran

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