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'पिता से रिश्ता अपनी जगह, मेरी निष्ठा BJP में' - स्वामी प्रसाद मौर्य के दांव से अलग संघमित्रा की नई राह

Published: Fri, 09 Oct 2026 07:00 AM (GMT+05:30)

संघमित्रा मौर्य अपने पिता स्वामी प्रसाद मौर्य के अलग राजनीतिक रास्ते के बावजूद भाजपा के प्रति अपनी निष्ठा दोहरा रही ...और पढ़ें

संघमित्रा मौर्य

संघमित्रा मौर्य

HighLights

  1. स्वामी प्रसाद मौर्य अलग पार्टी बनाकर आइएनडीआइ गठबंधन में तलाश रहे संभावना

अंकित गुप्ता, बदायूं। बसपा, भाजपा फिर सपा छोड़ अपनी जनता पार्टी बना चुके स्वामी प्रसाद मौर्य अब आइएनडीआइ (इंडी) गठबंधन में संभावना तलाश रहे। वह इसके पीछे तर्क देते कि किसी भी तरह भाजपा को रोकना है...। उनके इस कदम से इतर बेटी डाॅ. संघमित्रा मौर्य भाजपा में भविष्य तैयार करने के लिए मेहनत कर रहीं।

पिता की अलग राह राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के रूप में बदलेगी? सवाल पर डाॅ. संघमित्रा कहती हैं कि 'उनसे पारिवारिक विषयों पर ही बात होती है। उन्होंने वर्ष 2022 में ही मुझे अपने निर्णय लेने की छूट दे दी थी।

मैं भाजपा की निष्ठावान कार्यकर्ता हूं। बूथ स्तर तक काम करने का आधार चुनावी तैयारी नहीं, बल्कि पार्टी को मजबूती देना है।' उनका यह बयान संगठनात्मक सक्रियता वाला है, मगर इसकी पृष्ठभूमि में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी मानी जा रही।

लखनऊ से एमबीबीएस करने वाली डाॅ. संघमित्रा को पिता स्वामी प्रसाद मौर्य राजनीति में लाए थे। वर्ष 2010 में उन्होंने कासगंज के वार्ड सात से जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीता। इसके बाद एटा की अलीगंज सीट से विधानसभा चुनाव लड़ीं, मगर हार गई थीं।

वर्ष 2014 में सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के सामने बसपा के टिकट से मैनपुरी में लोकसभा चुनाव लड़ीं, उसमें भी हार हुई। वर्ष 2016 में पिता स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ उन्होंने भाजपा में राजनीतिक पारी शुरू की।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में डाॅ. संघमित्रा ने सपा के धर्मेंद्र यादव को 18,454 मतों से हराकर बदायूं में भाजपा का 28 साल का सूखा खत्म किया था। इसके बाद परिस्थितियां बदलती गईं।

वर्ष 2022 में स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा छोड़कर सपा में शामिल हुए, तब डाॅ. संघमित्रा ने उनके पक्ष में कई बयान दिए थे। वह भाजपा के प्रदेश के नेताओं पर सवाल उठाती थीं, मगर केंद्रीय नेतृत्व में सदैव आस्था प्रकट करती रहीं।

स्वामी प्रसाद मौर्य कुशीनगर की फाजिलनगर सीट से चुनाव लड़े, तब भी डाॅ. संघमित्रा प्रचार करने पहुंची थीं। उस समय अंदेशा जताया जाता था कि वह भी पिता के साथ अलग रास्ता तय कर सकती हैं, मगर ऐसा नहीं हुआ।

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें भाजपा ने टिकट नहीं दिया, इसके बावजूद पार्टी में सक्रिय रहीं। प्रत्याशी के पक्ष में सभाएं एवं जनसंपर्क करती थीं। बूथ स्तरीय कार्यक्रमों से लेकर संगठन के मंच पर उनकी उपस्थिति बनी हुई है।

डाॅ. संघमित्रा ने पिछड़ा वर्ग बहुलता वाला बदायूं जिला छोड़ा ना भाजपा में अपनी सक्रियता। वह सामाजिक आधार मजबूत करने में जुटी हैं। जिले की सभी छह विधानसभा सीटों पर मौर्य-शाक्य मतदाताओं की संख्या अच्छी है...यह बात भाजपा को पता है और डाॅ. संघमित्रा को भी।

यही कारण है कि दोनों एक-दूसरे का साथ दे रहे। यही कारण है कि इस सक्रियता को आगामी विधानसभा चुनाव से जोड़ा जा रहा। डाॅ. संघमित्रा पूर्व सांसद हैं, मगर बदली परिस्थितियों में दिल्ली के बजाय लखनऊ का रास्ता चुनने में संकोच नहीं करेंगी।

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